किसी भी न्यूज चैनल का आत्म सम्मान उसका गुरूर उसकी आई डी होती । जिस आईडी के सहारे पत्रकार सत्ता और सिस्टम से सवाल पूछता है, वही आईडी अगर किसी बाबा के चरणों में नजर आए तो सवाल उठना लाजिमी है!
करौली शंकर महादेव उर्फ करौली सरकार एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार मामला उनके कथित चमत्कार, दरबार या किसी धार्मिक दावे का नहीं, बल्कि पत्रकारिता के स्वाभिमान और मीडिया संस्थानों की प्रतिष्ठा से जुड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीर/दृश्य ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या किसी पत्रकार या मीडिया संस्थान की पहचान यानी उसकी आईडी किसी धार्मिक गुरु या बाबा के चरणों में रखी जानी चाहिए?
आईडी सिर्फ प्लास्टिक का कार्ड या गले में लटकने वाला पहचान-पत्र नहीं होती। वह पत्रकार के पीछे खड़े पूरे मीडिया संस्थान की पहचान होती है। वह उस संस्थान की विश्वसनीयता, गरिमा और पत्रकारिता के अधिकार का प्रतीक होती है।
लेकिन अगर यही आईडी किसी बाबा के पैरों में दिखाई दे, तो सवाल सिर्फ एक पत्रकार का नहीं रह जाता—सवाल पूरी पत्रकारिता की गरिमा का बन जाता है।
करौली शंकर महादेव और विवादों का पुराना रिश्ता
करौली शंकर महादेव को लेकर पिछले कुछ वर्षों में कई विवाद सामने आए हैं। 2023 में नोएडा के डॉक्टर सिद्धार्थ चौधरी के साथ विवाद और आश्रम में कथित मारपीट का मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा था।
विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में उनके पुराने आपराधिक मामलों का भी उल्लेख किया गया है। टाइम्स नाउ हिंदी की एक रिपोर्ट में हत्या के आरोप से जुड़े मुकदमे सहित उनके पुराने आपराधिक मामलों का जिक्र किया गया था।
वहीं, दूसरी रिपोर्टों में उनके आश्रम, संपत्ति और वहां होने वाले अनुष्ठानों को लेकर भी सवाल और विवाद सामने आते रहे हैं।
हालांकि पुराने मामलों में आरोप और मुकदमा होना अपने आप में दोष सिद्ध होना नहीं है। अंतिम फैसला अदालत का ही माना जाएगा।
लेकिन असली सवाल अब आईडी का है!
मीडिया संस्थानों की आईडी पत्रकार के लिए महज पहचान-पत्र नहीं होती।
वह आईडी कहती है—
“मैं सवाल पूछने आया हूं।”
वह आईडी कहती है—
“मेरे पीछे एक संस्थान खड़ा है।”
वह आईडी कहती है—
“मैं किसी के दरबार में दंडवत होने नहीं, खबर करने आया हूं।”
फिर सवाल उठता है कि अगर किसी बड़े मीडिया संस्थान की आईडी किसी बाबा के चरणों में रखी जाती है, तो इसे श्रद्धा, सम्मान या पत्रकारिता की सीमा के उल्लंघन में किस रूप में देखा जाना चाहिए?
IANS और ABP जैसे संस्थानों की प्रतिष्ठा पर भी सवाल
आईएएनएस और एबीपी जैसे स्थापित मीडिया संस्थानों की पहचान उनके पत्रकारों और उनकी पत्रकारिता से बनती है।
ऐसे में अगर किसी कार्यक्रम में उनके नाम वाली आईडी को किसी धार्मिक व्यक्ति के चरणों में रखा जाता है, तो यह देखना जरूरी है कि—
क्या यह संबंधित पत्रकार का निजी व्यवहार था?
क्या संस्थान को इसकी जानकारी थी?
क्या यह किसी विशेष कार्यक्रम या धार्मिक परंपरा का हिस्सा था?
या फिर—
क्या पत्रकारिता की पहचान को ही किसी व्यक्ति विशेष के सामने झुका दिया गया?
इन सवालों का जवाब संबंधित पत्रकार और संस्थान को देना चाहिए।
पत्रकार की कलम झुक सकती है क्या?
पत्रकार किसी से व्यक्तिगत श्रद्धा रख सकता है। कोई धार्मिक गुरु उसके लिए सम्माननीय हो सकता है। लेकिन पत्रकारिता की पहचान और निजी आस्था के बीच एक स्पष्ट सीमा होनी चाहिए।
क्योंकि जिस दिन पत्रकार की आईडी सवाल पूछने के बजाय किसी प्रभावशाली व्यक्ति के चरणों में नजर आने लगेगी, उस दिन आम आदमी यह पूछने का अधिकार रखता है—
“फिर खबर कौन करेगा और सवाल कौन पूछेगा?”
करौली शंकर महादेव के दरबार में आईडी रखे जाने का कथित दृश्य इसलिए महज एक तस्वीर नहीं है।
यह पत्रकारिता के आत्मसम्मान बनाम व्यक्तिगत आस्था की बहस है।
और इस बहस का जवाब किसी बाबा को नहीं, मीडिया संस्थानों और पत्रकार बिरादरी को देना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल—
क्या पत्रकारिता की पहचान किसी के चरणों में रखी जा सकती है?
क्या मीडिया की आईडी भी अब श्रद्धा का प्रतीक बन जाएगी?
और अगर आईडी झुक गई तो क्या पत्रकारिता भी झुक गई?
यही सवाल आज सबसे ज्यादा जरूरी है।
सवाल सिर्फ एक बाबा का नहीं… सवाल पत्रकारिता के उस स्वाभिमान का है, जिसे कभी न्यूज़ चैनल की सबसे बड़ी पहचान माना जाता था।
किसी भी न्यूज़ चैनल का आत्मसम्मान उसकी इमारत, स्टूडियो या स्क्रीन पर चमकता हुआ लोगो नहीं होता।
उसकी असली पहचान होती है उसकी आईडी।
वही आईडी जिसे गले में डालकर पत्रकार मैदान में उतरता है।
वही आईडी जो बताती है कि उसके पीछे एक संस्थान, उसकी संपादकीय नीति और पत्रकारिता की विश्वसनीयता खड़ी है।
लेकिन सवाल तब उठता है जब प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों की यही पहचान किसी ऐसे व्यक्ति के घुटनों/पेरो में रखी नजर आए, जिसके अतीत और वर्तमान को लेकर सार्वजनिक रूप से गंभीर सवाल उठते रहे हों।
मामला है करौली शंकर महादेव महाराज, जिन्हें करौली सरकार के नाम से भी जाना जाता है।
मीडिया रिपोर्टों में उनके पुराने दौर को लेकर 1992 से 1995 के बीच हत्या समेत कई धाराओं में मुकदमे दर्ज होने का उल्लेख मिलता है। कुछ रिपोर्टों में जमीन पर कथित अवैध कब्जे और दस्तावेजों में गड़बड़ी के आरोपों का भी जिक्र किया गया है। हालांकि इन आरोपों को किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
यानी सवाल यह नहीं है कि किसी व्यक्ति का अतीत क्या था और आज उसकी धार्मिक पहचान क्या है।
सवाल इससे बड़ा है—
क्या मीडिया संस्थानों की प्रतिष्ठा इतनी सस्ती हो गई है कि उनकी आईडी भी किसी बाबा के दरबार में जाकर अपनी गरिमा खो दे?
आज करौली शंकर महादेव को बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म पर जगह मिल रही है।
एबीपी न्यूज़ ने जनवरी 2025 में उनके साथ विशेष कार्यक्रम भी किया था, जिसमें उन्होंने ‘वैदिक DNA’ समेत कई मुद्दों पर बात की।
2026 में उन्हें श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन से महामंडलेश्वर बनाए जाने की खबरें भी सामने आईं।
धार्मिक पद मिले, सम्मान मिले, मंच मिले—यह अलग विषय है।
लेकिन पत्रकारिता का सवाल फिर भी अपनी जगह कायम है।
क्योंकि पत्रकार की आईडी सिर्फ प्लास्टिक का कार्ड नहीं है।
वह उसके संस्थान का स्वाभिमान है।
वह आईडी किसी नेता के सामने नहीं झुकनी चाहिए।
किसी उद्योगपति के सामने नहीं झुकनी चाहिए।
किसी अधिकारी के सामने नहीं झुकनी चाहिए।
और किसी बाबा या महाराज के चरणों में भी नहीं रखी जानी चाहिए।
पत्रकारिता का काम सवाल पूछना है—
चाहे सामने सत्ता हो, संत हो, उद्योगपति हो या कोई प्रभावशाली व्यक्ति।
जब पत्रकार सवाल पूछने के बजाय किसी प्रभावशाली शख्सियत के दरबार में अपनी संस्थागत पहचान समर्पित करता दिखाई देता है, तो सवाल सिर्फ उस पत्रकार पर नहीं उठता।
सवाल पूरे संस्थान की संपादकीय रीढ़ पर उठता है।
आईडी की कीमत समझनी होगी
एक समय था जब किसी बड़े चैनल की आईडी देखकर अधिकारी सावधान हो जाता था।
उसे पता होता था—
यह पत्रकार सवाल पूछने आया है।
आज अगर वही आईडी किसी दरबार की तस्वीर में महज एक प्रतीक बनकर रह जाए, तो यह पत्रकारिता के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
आईएनएस हो, एबीपी हो या कोई दूसरा बड़ा मीडिया संस्थान—उनकी पहचान किसी व्यक्ति की कृपा से नहीं, उनकी पत्रकारिता की विश्वसनीयता से बनती है।
मीडिया संस्थान जितना बड़ा होता है, उसकी जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी होती है।
इसलिए सवाल किसी एक व्यक्ति की श्रद्धा या आस्था का नहीं है।
सवाल है—
क्या पत्रकारिता की आईडी अब सवाल पूछने की ताकत है या किसी दरबार में सम्मान पाने का पास?
अगर आईडी पत्रकार के गले में है, तो उसके साथ पत्रकारिता का स्वाभिमान भी होना चाहिए।
और अगर वही आईडी किसी के चरणों में रख दी गई…
तो फिर सवाल सिर्फ आईडी का नहीं रहता।
सवाल यह होता है कि आखिर पत्रकारिता का स्वाभिमान किसके चरणों में रख दिया गया?
