हरिद्वार। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन जब पत्रकारिता की पहचान का इस्तेमाल किसी दूसरे कारोबारी या निजी हित के लिए किए जाने के आरोप सामने आएं तो सवाल उठना स्वाभाविक है। हरिद्वार में भी इन दिनों कुछ ऐसे मामलों को लेकर चर्चाएं हैं, जहां खुद को पत्रकार बताने वाले कुछ लोगों की कारोबारी गतिविधियों पर सवाल उठ रहे हैं।
आरोप है कि शहर में कुछ लोग पत्रकारिता से जुड़े होने की पहचान के साथ-साथ रेस्टोरेंट जैसे कारोबार भी संचालित कर रहे हैं। इनमें से एक मामले में यह भी दावा किया जा रहा है कि SSP और जिलाधिकारी कार्यालय के आसपास स्थित एक रेस्टोरेंट में ग्राहकों को शराब परोसी जा रही है। यदि ऐसा हो रहा है तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि संबंधित प्रतिष्ठान के पास इसके लिए वैध आबकारी अनुज्ञापन है या नहीं?
पत्रकारिता अलग, कारोबार अलग—लेकिन नियम सबके लिए एक?
किसी व्यक्ति का पत्रकार होना अपने आप में किसी कारोबारी गतिविधि पर रोक नहीं लगाता। लेकिन यदि किसी रेस्टोरेंट में शराब परोसी जा रही है तो उसके लिए लागू आबकारी नियमों और आवश्यक लाइसेंस का पालन करना जरूरी है।
उत्तराखंड आबकारी विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर रेस्टोरेंट बार एवं होटल बार के लिए अलग अनुज्ञापन व्यवस्था उपलब्ध है। विभाग की जानकारी के अनुसार शराब से संबंधित विभिन्न गतिविधियों के लिए लाइसेंस व्यवस्था लागू है।
बार लाइसेंस की प्रक्रिया में संबंधित दस्तावेजों की जांच, जिला आबकारी अधिकारी की निरीक्षण रिपोर्ट, पुलिस से संबंधित रिपोर्ट और जिलाधिकारी स्तर पर परीक्षण जैसी प्रक्रियाएं भी शामिल हैं।
ऐसे में हरिद्वार में किसी रेस्टोरेंट में शराब परोसे जाने की स्थिति में यह जानना महत्वपूर्ण है कि वहां किस श्रेणी का आबकारी लाइसेंस जारी है, उसकी वैधता कितनी है और लाइसेंस में निर्धारित शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं।
SSP और DM कार्यालय के आसपास कारोबार, फिर भी निगरानी पर सवाल?
जिस मामले की चर्चा हो रही है, उसमें रेस्टोरेंट के आसपास ही जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के कार्यालय मौजूद होने की बात कही जा रही है।
यही वजह है कि मामले को लेकर सवाल और गंभीर हो जाते हैं—यदि वास्तव में वहां नियमित रूप से शराब परोसी जा रही है तो संबंधित विभागों की नजर इस गतिविधि पर है या नहीं?
हालांकि केवल किसी सरकारी कार्यालय के पास रेस्टोरेंट होना अपने आप में शराब परोसने को अवैध साबित नहीं करता। असली सवाल लाइसेंस और उसकी शर्तों के अनुपालन का है।
‘पत्रकार’ होने का परिचय क्या जांच से बचने की ढाल बन सकता है?
इस पूरे मामले में एक दूसरा सवाल पत्रकारिता की साख से भी जुड़ा है।
यदि कोई व्यक्ति पत्रकार होने का दावा करता है और साथ में व्यवसाय भी संचालित करता है, तो इसमें अपने आप कोई गैरकानूनी बात नहीं है। लेकिन पत्रकारिता की पहचान का इस्तेमाल यदि किसी गतिविधि पर प्रशासनिक कार्रवाई से बचने, दबाव बनाने या निजी कारोबारी हित साधने के लिए किया जाता है, तो यह गंभीर सार्वजनिक-interest का विषय बन सकता है।
इसलिए जरूरत किसी व्यक्ति को केवल उसके पेशे या पहचान के आधार पर कटघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट करने की है।
आबकारी विभाग के सामने कुछ सीधे सवाल
मामले में आबकारी विभाग से कुछ सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए—
- संबंधित रेस्टोरेंट के नाम पर आबकारी लाइसेंस है या नहीं?
- यदि लाइसेंस है तो वह किस श्रेणी का है?
- लाइसेंस की वैधता कब तक है?
- क्या प्रतिष्ठान में शराब परोसने की अनुमति उसी स्थान के लिए है?
- क्या हाल में आबकारी विभाग ने वहां निरीक्षण किया?
- क्या पुलिस अथवा प्रशासन की ओर से कोई सत्यापन किया गया?
- क्या लाइसेंस की निर्धारित शर्तों का पालन हो रहा है?
इन सवालों का जवाब सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला नियमों के अनुरूप है या किसी तरह के उल्लंघन का।
प्रशासन चाहे तो कुछ ही मिनट में साफ हो सकती है तस्वीर
इस मामले में सबसे आसान रास्ता यह है कि जिला आबकारी विभाग और जिला प्रशासन संबंधित प्रतिष्ठान के लाइसेंस रिकॉर्ड की जांच करे।
यदि लाइसेंस वैध है और सभी शर्तों का पालन हो रहा है तो उठ रहे सवालों पर स्वतः विराम लग सकता है। यदि लाइसेंस नहीं है या लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई का रास्ता खुलता है।
उत्तराखंड आबकारी विभाग की वेबसाइट पर 2026-27 और 2027-28 के लिए लाइसेंस एवं अन्य अनुज्ञापनों से संबंधित नवीनतम निर्देश भी उपलब्ध हैं।
पत्रकारिता की विश्वसनीयता का भी सवाल
हरिद्वार जैसे धार्मिक और पर्यटन शहर में पत्रकारिता से जुड़े लोगों की भूमिका को लेकर जनता की अपेक्षाएं अलग होती हैं। पत्रकार यदि किसी कारोबारी गतिविधि में भी शामिल है तो उसे अपने पेशे की विश्वसनीयता और निजी हितों के बीच स्पष्ट दूरी बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
इस पूरे मामले में किसी व्यक्ति को बिना आधिकारिक जांच के ‘अवैध शराब कारोबारी’ या ‘अवैध धंधा करने वाला पत्रकार’ कहना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि शराब परोसने की बात सामने आई है तो उसके लाइसेंस और संचालन की जांच की मांग करना पूरी तरह अलग विषय है।
अब देखना यह है कि हरिद्वार आबकारी विभाग, पुलिस और जिला प्रशासन इस मामले में लाइसेंस रिकॉर्ड की जांच करते हैं या नहीं। अगर प्रतिष्ठान के पास वैध अनुमति है तो रिकॉर्ड सार्वजनिक होने से स्थिति साफ होगी और अगर नियमों का उल्लंघन है तो कार्रवाई की जिम्मेदारी संबंधित विभागों की होगी।
सबसे बड़ा सवाल यही है—पत्रकारिता की पहचान के पीछे कारोबार चल रहा है या कारोबार भी पूरी तरह नियम-कायदे के तहत है? इसका जवाब अब दस्तावेज और सरकारी जांच ही दे सकती है।
