कलम, खबर और ख्वाब
हरिद्वार से अपनी पहचान बनाने तक की एक पत्रकार की कहानी
लेखक: संजय कुमार कश्यप
भूमिका
हर इंसान की जिंदगी में कुछ ऐसी कहानियां होती हैं, जिन्हें वह दुनिया को नहीं बताता।
कुछ संघर्ष ऐसे होते हैं, जिनकी कोई खबर नहीं बनती।
कुछ रातें ऐसी होती हैं, जब इंसान अकेला होता है और खुद से पूछता है—
“क्या मैं सही रास्ते पर हूं?”
और कुछ सपने ऐसे होते हैं, जो बार-बार टूटने के बावजूद आदमी उनका पीछा करना नहीं छोड़ता।
यह कहानी ऐसे ही एक सफर की है।
यह सिर्फ एक पत्रकार की कहानी नहीं है। यह उस आदमी की कहानी है जिसने खबरों की दुनिया में अपनी जगह बनाने की कोशिश की, सवाल पूछे, लोगों की आवाज बनने की कोशिश की और कई बार खुद भी सवालों के घेरे में आया। कानून के घेरे में आया
नाम है—संजय कुमार कश्यप।
उत्तराखण्ड राज्य का एक शहर — हरिद्वार।
और कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
जहां से कहानी शुरू हुई
हर कहानी की शुरुआत किसी बड़े मंच से नहीं होती।
कई बार कहानी एक छोटे शहर की गलियों से शुरू होती है, जहां सपने बड़े होते हैं लेकिन उन्हें पूरा करने के साधन छोटे।
हरिद्वार सिर्फ एक शहर नहीं है। यहां हर दिन हजारों लोग आते हैं, हजारों कहानियां छोड़ जाते हैं और हजारों नई कहानियां अपने साथ लेकर लौटते हैं।
इसी माहौल में संजय कुमार कश्यप ने अपनी जिंदगी का रास्ता तलाशना शुरू किया।
समय के साथ उनका झुकाव पत्रकारिता की ओर बढ़ता गया।
खबरें उन्हें सिर्फ खबरें नहीं लगती थीं।
उनके पीछे उन्हें इंसान दिखाई देते थे।
किसी की परेशानी।
किसी की शिकायत।
किसी का संघर्ष।
किसी व्यवस्था का सवाल।
और कभी-कभी सत्ता और सिस्टम से टकराती हुई किसी आम आदमी की आवाज।
यहीं से कलम और कैमरे के साथ उनका रिश्ता मजबूत होता गया।
पत्रकार बनना आसान नहीं था
इसका पूरा क्रेडिट पत्रकार / डाक्टर रुपेश शर्मा को जाता है जब सन: 2010 में संजय कश्यप को न्यूज़ एक्सप्रेस में नौकरी दिलाने वाले पत्रकार रुपेश शर्मा का अपने गुरु पंकज कौशिक से किसी मुद्दे पर मतभेद हो गया था।
बातचीत बढ़ी तो दोनों के बीच तीखी बहस की स्थिति बन गई। रुपेश शर्मा अपने गुरु पंकज कौशिक के साथ बेबाक अंदाज में अपनी बात रखते नजर आए। पत्रकारिता के सफर में गुरु-शिष्य के इस रिश्ते का यह किस्सा आज भी चर्चा में आता है।
पत्रकारिता बाहर से जितनी चमकदार दिखाई देती है, भीतर से उतनी ही कठिन है।
एक खबर के लिए फोन करना।
दूसरे फोन का इंतजार करना।
किसी अधिकारी से बात करने की कोशिश।
किसी पीड़ित के घर पहुंचना।
किसी दस्तावेज को खोजना।
और फिर यह तय करना कि खबर में क्या लिखा जाए और क्या नहीं।
समय के साथ संजय ने समझा कि पत्रकारिता केवल लिख देने का नाम नहीं है।
पत्रकारिता एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी है।
एक गलत शब्द किसी की प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकता है।
एक गलत तस्वीर किसी निर्दोष व्यक्ति को विवाद में डाल सकती है।
एक अपुष्ट खबर किसी परिवार को परेशान कर सकती है।
और एक सही सवाल कभी-कभी पूरी व्यवस्था को आईना दिखा सकता है।
यही समझ धीरे-धीरे उनके पत्रकारिता सफर का हिस्सा बनती गई।
खबरों के पीछे भागता एक आदमी
हर पत्रकार के जीवन में एक समय आता है जब खबर नौकरी नहीं रहती—जुनून बन जाती है।
संजय के लिए भी खबरों की दुनिया कुछ ऐसी ही होती चली गई।
स्थानीय खबरों से लेकर मीडिया जगत की खबरों तक उनकी रुचि बढ़ती गई।
हरिद्वार और उत्तराखंड की घटनाएं चाहे वो 2011 का शांतिकुंज का कुम्भ मेला हो जहा एक छोटी सी गलती से “भगदड़” मच गई थी जिसमे 26 लोगो को अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया था और कई सौ लोग इस “भगदड़” में घायल हो गए थे वही फिर चाहे जुन 2013 केदारनाथ में आई आपदा हो वहा भी अपने चहिते गुरु पत्रकार रुपेश शर्मा के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चले जो उनके काम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं।
पुलिस।
प्रशासन।
राजनीति।
मीडिया।
सामाजिक घटनाएं।
पत्रकारों के बीच की गतिविधियां।
और वे मुद्दे जिन्हें मुख्यधारा की चमकदार खबरों में अक्सर जगह नहीं मिलती।
उनकी शैली में एक बात लगातार दिखाई देती रही—
सवाल पूछो।
लेकिन समय ने उन्हें यह भी सिखाया कि सवाल पूछने वाले पत्रकार को अपने शब्दों की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है। वरना वही सवाल उस पत्रकार पर भारी पड़ जाता है
पत्रकारिता जब खुद सवालों के घेरे में आई
पत्रकार दूसरों से सवाल करता है।
लेकिन एक दिन ऐसा भी आता है जब सवाल पत्रकार से पूछे जाते हैं।
संजय के सफर में ऐसे मौके भी आए जब खबर, भाषा, आरोप, दस्तावेज और कानूनी जोखिम—सब एक साथ सामने खड़े दिखाई दिए। कई बार तो ऐसे ऐसे अपने खास लोगो ने पीठ में छुरा घोपा जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी
यहीं पत्रकारिता का दूसरा चेहरा सामने आया।
किसी खबर में क्या लिखा जाए?
किसी व्यक्ति को “आरोपी” “अपराधी” कब कहा जाए?
अदालत में मामला लंबित हो तो भाषा कैसी हो?
किसी आरोप को तथ्य की तरह लिखने और आरोप के रूप में लिखने में कितना फर्क है?
इन सवालों ने पत्रकारिता को उनके लिए सिर्फ पेशा नहीं रहने दिया।
यह एक लगातार सीखने वाली प्रक्रिया बन गई।
नाम से ज्यादा जरूरी पहचान
पत्रकार की असली पूंजी क्या है?
कैमरा?
माइक?
न्यूज़ पोर्टल?
सोशल मीडिया फॉलोअर्स?
शायद नहीं।
असली पूंजी है—विश्वसनीयता।
क्योंकि एक बार पाठक को लगे कि खबर पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो सबसे बड़ा मीडिया संस्थान भी कमजोर पड़ जाता है।
इसीलिए संजय की पत्रकारिता की यात्रा में एक विचार लगातार मजबूत हुआ—
खबर तेज हो सकती है, लेकिन तथ्य से तेज नहीं।
तस्वीर प्रकाशित करने से पहले पहचान की पुष्टि।
आरोप प्रकाशित करने से पहले दस्तावेज।
किसी पक्ष के खिलाफ खबर हो तो उसका पक्ष जानने की कोशिश।
और जहां तथ्य उपलब्ध न हों, वहां भाषा में सावधानी।
पत्रकारिता की दुनिया में यह सीख शायद किसी किताब से ज्यादा वास्तविक अनुभवों ने दी।
भड़ास वाली कलम
समय के साथ संजय की लेखन शैली में एक अलग रंग दिखाई देने लगा।
सीधी।
तेज।
चटपटी।
सवाल पूछने वाली।
मीडिया की खबरों में मीडिया से भी सवाल करने वाली।
उनकी पसंद की पत्रकारिता में सिर्फ प्रेस रिलीज छाप देना पर्याप्त नहीं था।
खबर में सवाल होना चाहिए।
पाठक को रुककर पढ़ने पर मजबूर करने वाला शीर्षक होना चाहिए।
लेकिन साथ ही शब्दों की कानूनी सीमा का ध्यान रखना भी जरूरी था।
यही संतुलन उनकी लेखन शैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता गया।
पत्रकारों की दुनिया
पत्रकारिता की दुनिया को बाहर से देखने वाला व्यक्ति अक्सर समझता है कि सभी पत्रकार एक ही टीम हैं।
लेकिन भीतर की दुनिया कहीं अधिक जटिल है।
यहां प्रतिस्पर्धा है।
नेटवर्क है।
राजनीति है।
दोस्ती है।
मतभेद हैं।
संघर्ष हैं।
और अपनी पहचान बनाने की लगातार कोशिश भी।
संजय ने इस दुनिया को करीब से देखा।
पत्रकारों के संगठन।
प्रेस क्लब।
स्थानीय मीडिया।
डिजिटल पोर्टल।
टीवी चैनल।
स्ट्रिंगर।
रिपोर्टर।
संपादक।
और बदलता हुआ डिजिटल मीडिया।
इन सबने उन्हें यह समझाया कि पत्रकारिता केवल खबर लिखने का काम नहीं है।
यह एक पूरी इंडस्ट्री है।
अपना कुछ करने का सपना
एक समय के बाद दूसरे के मंच पर काम करने वाला व्यक्ति सोचता है—
“अपना मंच क्यों न बनाया जाए?”
संजय के भीतर भी यह विचार मजबूत हुआ।
एक ऐसा नेटवर्क जो सिर्फ एक शहर तक सीमित न हो।
एक ऐसा समाचार संगठन जिसमें खबर, फोटो और वीडियो एक व्यवस्थित फीड की तरह उपलब्ध हों।
यहीं से अपनी न्यूज़ एजेंसी का सपना आकार लेने लगा।
ANI, PTI, UNI और IANS जैसी संस्थाओं को देखकर प्रेरणा लेना एक बात थी।
लेकिन उनकी नकल करना दूसरी।
संजय का विचार अलग पहचान बनाने का था।
नाम अलग।
पहचान अलग।
लोगो अलग।
माइक आईडी अलग।
और काम करने का अपना तरीका।
NNA — एक सपना, एक शुरुआत
हर बड़े संस्थान की शुरुआत कभी न कभी एक छोटे विचार से हुई होगी।
संजय के लिए वह विचार था—NNA।
शुरुआत हरिद्वार से।
लक्ष्य राष्ट्रीय नेटवर्क।
स्थानीय रिपोर्टर।
जिला संवाददाता।
वीडियो जर्नलिज्म।
फोटो।
ग्राउंड रिपोर्ट।
और देश के बड़े टीवी तथा डिजिटल न्यूज़ संस्थानों तक समाचार पहुंचाने का सपना।
यह केवल कंपनी बनाने का विचार नहीं था।
यह अपनी पत्रकारिता की पहचान बनाने की कोशिश थी।
एक ऐसी पहचान जिसमें लिखा हो—
“खबर यहां से शुरू होती है।”
सपनों की कीमत
सपना देखना मुफ्त है।
लेकिन उसे पूरा करने की कीमत होती है।
पैसा चाहिए।
लोग चाहिए।
तकनीक चाहिए।
नेटवर्क चाहिए।
विश्वास चाहिए।
और सबसे ज्यादा चाहिए—धैर्य।
कई बार योजनाएं कागज पर बहुत आसान लगती हैं।
लेकिन जमीन पर उतरते ही असली मुश्किलें सामने आती हैं।
एक रिपोर्टर चाहिए तो उसके खर्च का सवाल।
वीडियो चाहिए तो उपकरण का सवाल।
न्यूज़ फीड चाहिए तो तकनीक का सवाल।
ग्राहक चाहिए तो नेटवर्किंग का सवाल।
और हर दिन नई खबर चाहिए तो पूरी टीम का सवाल।
फिर भी सपना बना रहा।
क्योंकि कुछ सपने सुविधा से नहीं, जिद से पूरे होते हैं।
जब जिंदगी खुद खबर बन जाती है
पत्रकार दूसरों की जिंदगी लिखता है।
लेकिन कई बार उसकी अपनी जिंदगी भी खबरों जैसी हो जाती है।
कभी आरोप।
कभी विवाद।
कभी गलतफहमी।
कभी समर्थन।
कभी आलोचना।
कभी प्रशंसा।
और कभी अकेले बैठकर खुद से सवाल।
ऐसे समय में इंसान को तय करना पड़ता है कि वह परिस्थितियों से अपनी पहचान बनाएगा या अपनी पहचान से परिस्थितियों का सामना करेगा।
संजय की कहानी में यह मोड़ बार-बार आता है।
और हर बार एक चीज बची रहती है—
कलम।
हार और वापसी
हर सफर में ऐसे दिन आते हैं जब लगता है कि सब कुछ रुक गया है।
लेकिन जिंदगी का सबसे बड़ा सच शायद यही है—
रुकना और हार जाना एक ही बात नहीं है।
कभी आदमी पीछे हटता है ताकि आगे बढ़ सके।
कभी चुप रहता है ताकि सही समय पर बोले।
कभी योजना बदलता है ताकि मंजिल वही रहे।
संजय के सफर में भी ऐसे पड़ाव आए।
लेकिन पत्रकारिता और अपने काम को लेकर उनकी जिज्ञासा बनी रही।
नई खबर।
नई कहानी।
नया विचार।
नई योजना।
और फिर एक नया प्रयास।
हरिद्वार से आगे
एक छोटे शहर से राष्ट्रीय स्तर की पहचान बनाने का सपना आसान नहीं।
लेकिन हर बड़े नेटवर्क की शुरुआत कहीं न कहीं से होती है।
संजय के लिए वह शुरुआत हरिद्वार है।
यहीं की गलियां।
यहीं की खबरें।
यहीं के पत्रकार।
यहीं के संघर्ष।
यहीं के सवाल।
और यहीं से राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचने की इच्छा।
शायद आने वाले वर्षों में NNA केवल एक नाम न रहे।
शायद यह एक ऐसा नेटवर्क बने जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से खबरें आएं।
लेकिन उस कहानी की शुरुआत हमेशा याद रहेगी—
एक आदमी ने हरिद्वार से सपना देखा था।
मेरी सबसे बड़ी पूंजी
अगर कभी मुझसे पूछा जाए कि जिंदगी ने मुझे क्या दिया?
तो शायद मैं कहूंगा—
अनुभव।
लोगों को समझने की क्षमता।
गलतियों से सीखने की आदत।
सवाल पूछने की हिम्मत।
और फिर से शुरू करने की ताकत।
मेरे पास शायद हर सवाल का जवाब नहीं है।
लेकिन सवाल पूछने की आदत अभी भी है।
और शायद यही पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है।
कहानी अभी बाकी है
किसी व्यक्ति की जिंदगी की किताब उसकी मृत्यु पर खत्म नहीं होती।
कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जिनका सबसे महत्वपूर्ण अध्याय अभी लिखा ही नहीं गया होता।
मेरी कहानी भी ऐसी ही है।
मैंने खबरें लिखी हैं।
दूसरों की कहानियां लिखी हैं।
मीडिया को करीब से देखा है।
मीडिया पर सवाल उठते देखे हैं।
खुद भी सवालों के बीच रहा हूं।
और अब अपना एक बड़ा सपना लेकर आगे बढ़ रहा हूं।
एक ऐसा समाचार नेटवर्क बनाने का सपना, जिसकी पहचान सिर्फ उसके नाम से नहीं बल्कि उसकी खबरों की विश्वसनीयता से हो।
शायद रास्ते में फिर मुश्किलें आएंगी।
शायद आलोचना होगी।
शायद कुछ लोग साथ छोड़ेंगे।
शायद कुछ नए लोग साथ आएंगे।
लेकिन कहानी चलती रहेगी।
क्योंकि—
कलम अभी रुकी नहीं है।
खबर अभी खत्म नहीं हुई है।
और सपना अभी पूरा नहीं हुआ है।
उपसंहार
हर इंसान अपनी जिंदगी में कुछ छोड़कर जाना चाहता है।
कोई पैसा।
कोई संपत्ति।
कोई पद।
कोई पहचान।
लेकिन एक पत्रकार के लिए शायद सबसे बड़ी विरासत उसकी लिखी हुई बातें होती हैं।
वे खबरें जिन्हें किसी ने पढ़ा।
वे सवाल जिन्हें किसी ने सुना।
वे मुद्दे जिन्हें किसी ने पहली बार उठाया।
और वे लोग जिन्हें लगा कि उनकी आवाज किसी ने सुनी।
मेरी कहानी भी इसी उम्मीद के साथ आगे बढ़ रही है।
हरिद्वार से शुरू हुआ सफर अभी जारी है।
नाम—संजय कुमार कश्यप।
पहचान—पत्रकार।
सपना—अपना राष्ट्रीय समाचार नेटवर्क।
और जिंदगी की किताब का आखिरी पन्ना?
वह अभी खाली है।
