किसी भी न्यूज चैनल का आत्म सम्मान उसका गुरूर उसकी आई डी होती ।
“किसी भी न्यूज़ चैनल की पहचान सिर्फ उसकी स्क्रीन पर दिखने वाला लोगो नहीं होता
उसकी असली पहचान होती है उसकी ‘आईडी’—वह आईडी, जिसे लेकर एक पत्रकार अपनी आवाज़ समाज तक पहुँचाता है।
यह आईडी महज़ एक माइक नहीं होती,
यह उस संस्थान का आत्मसम्मान होती है,
उसकी प्रतिष्ठा होती है,
उसकी विश्वसनीयता होती है और कहीं न कहीं उसका गुरूर भी।
जिस आईडी को पत्रकार अपने हाथ में लेकर सच के सवाल पूछता है,
जिसके पीछे पूरा संस्थान खड़ा होता है,
उसी आईडी को अगर किसी के पैरों में यूँ रख दिया जाए सिर्फ उस आदमी की चापलूसी के लिए यह पत्रकारिता जैसे पेशे के साथ न्याय संगत नहीं है। पत्रकारिता में पढ़ाया जाता है कि पत्रकारिता के आगे किसी भी व्यक्ति का इतना बड़ा कद नहीं है जिसके चरणों में पत्रकारिता को समर्पित किया जा सके।
तो सवाल सिर्फ एक माइक के रखे जाने का नहीं है
सवाल पत्रकारिता की गरिमा का है।
सवाल उस संस्थान के सम्मान का है।
सवाल उस भरोसे का है, जो समाज एक न्यूज़ चैनल की आईडी देखकर करता है।
आईडी को पैरों के नीचे रखना शायद तस्वीर में एक छोटी-सी बात दिखाई दे…
लेकिन पत्रकारिता के लिए यह तस्वीर बहुत कुछ कह जाती है।
क्योंकि आईडी सिर्फ पहचान नहीं होत
वह पत्रकारिता का स्वाभिमान होती है।
और स्वाभिमान को सम्मान की जगह चाहिए…
किसी के पैरों के पास नहीं।”
एक छोटी, तीखी लाइन
“माइक फर्श पर पड़ा है, लेकिन सवाल उससे कहीं बड़ा है—क्या हमने पत्रकारिता की आवाज़ के साथ उसका सम्मान भी फर्श पर रख दिया है?”
सवाल सिर्फ एक बाबा का नहीं… सवाल पत्रकारिता के उस स्वाभिमान का है, जिसे कभी न्यूज़ चैनल की सबसे बड़ी पहचान माना जाता था।
किसी भी न्यूज़ चैनल का आत्मसम्मान उसकी इमारत, स्टूडियो या स्क्रीन पर चमकता हुआ लोगो नहीं होता।
उसकी असली पहचान होती है उसकी आईडी।
वही आईडी जिसे गले में डालकर पत्रकार मैदान में उतरता है।
वही आईडी जो बताती है कि उसके पीछे एक संस्थान, उसकी संपादकीय नीति और पत्रकारिता की विश्वसनीयता खड़ी है।
लेकिन सवाल तब उठता है जब प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों की यही पहचान किसी ऐसे व्यक्ति के चरणों में रखी नजर आए, जिसके अतीत और वर्तमान को लेकर सार्वजनिक रूप से गंभीर सवाल उठते रहे हों।
मामला है करौली शंकर महादेव महाराज, जिन्हें करौली सरकार के नाम से भी जाना जाता है।
मीडिया रिपोर्टों में उनके पुराने दौर को लेकर 1992 से 1995 के बीच हत्या समेत कई धाराओं में मुकदमे दर्ज होने का उल्लेख मिलता है। कुछ रिपोर्टों में जमीन पर कथित अवैध कब्जे और दस्तावेजों में गड़बड़ी के आरोपों का भी जिक्र किया गया है। हालांकि इन आरोपों को किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
यानी सवाल यह नहीं है कि किसी व्यक्ति का अतीत क्या था और आज उसकी धार्मिक पहचान क्या है।
सवाल इससे बड़ा है—
क्या मीडिया संस्थानों की प्रतिष्ठा इतनी सस्ती हो गई है कि उनकी आईडी भी किसी बाबा के दरबार में जाकर अपनी गरिमा खो दे?
आज करौली शंकर महादेव को बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म पर जगह मिल रही है।
एबीपी न्यूज़ ने जनवरी 2025 में उनके साथ विशेष कार्यक्रम भी किया था, जिसमें उन्होंने ‘वैदिक DNA’ समेत कई मुद्दों पर बात की।
2026 में उन्हें श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन से महामंडलेश्वर बनाए जाने की खबरें भी सामने आईं।
धार्मिक पद मिले, सम्मान मिले, मंच मिले—यह अलग विषय है।
लेकिन पत्रकारिता का सवाल फिर भी अपनी जगह कायम है।
क्योंकि पत्रकार की आईडी सिर्फ प्लास्टिक का कार्ड नहीं है।
वह उसके संस्थान का स्वाभिमान है।
वह आईडी किसी नेता के सामने नहीं झुकनी चाहिए।
किसी उद्योगपति के सामने नहीं झुकनी चाहिए।
किसी अधिकारी के सामने नहीं झुकनी चाहिए।
और किसी बाबा या महाराज के चरणों में भी नहीं रखी जानी चाहिए।
पत्रकारिता का काम सवाल पूछना है—
चाहे सामने सत्ता हो, संत हो, उद्योगपति हो या कोई प्रभावशाली व्यक्ति।
जब पत्रकार सवाल पूछने के बजाय किसी प्रभावशाली शख्सियत के दरबार में अपनी संस्थागत पहचान समर्पित करता दिखाई देता है, तो सवाल सिर्फ उस पत्रकार पर नहीं उठता।
सवाल पूरे संस्थान की संपादकीय रीढ़ पर उठता है।
आईडी की कीमत समझनी होगी
एक समय था जब किसी बड़े चैनल की आईडी देखकर अधिकारी सावधान हो जाता था।
उसे पता होता था—
यह पत्रकार सवाल पूछने आया है।
आज अगर वही आईडी किसी दरबार की तस्वीर में महज एक प्रतीक बनकर रह जाए, तो यह पत्रकारिता के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
आईएनएस हो, एबीपी हो या कोई दूसरा बड़ा मीडिया संस्थान—उनकी पहचान किसी व्यक्ति की कृपा से नहीं, उनकी पत्रकारिता की विश्वसनीयता से बनती है।
मीडिया संस्थान जितना बड़ा होता है, उसकी जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी होती है।
इसलिए सवाल किसी एक व्यक्ति की श्रद्धा या आस्था का नहीं है।
सवाल है—
क्या पत्रकारिता की आईडी अब सवाल पूछने की ताकत है या किसी दरबार में सम्मान पाने का पास?
अगर आईडी पत्रकार के गले में है, तो उसके साथ पत्रकारिता का स्वाभिमान भी होना चाहिए।
और अगर वही आईडी किसी के चरणों में रख दी गई…
तो फिर सवाल सिर्फ आईडी का नहीं रहता।
सवाल यह होता है कि आखिर पत्रकारिता का स्वाभिमान किसके चरणों में रख दिया गया?
नोट – अगर आपके फोन में लिंक ना खुले तो इस नंबर 9411111862 को सेव कर ले लिंक खुल जाएगा इसलिए बताया जा रहा है कि कुछ पत्रकार भाईयों की शिकायत है कि लिंक नहीं खुल रहा है
