जयपुर में पत्रकारों का उबाल: 8वें दिन भी जारी धरना, कलेक्टर कार्रवाई और सरकार की चुप्पी पर उठे बड़े सवाल
राजस्थान की राजधानी जयपुर इन दिनों एक बड़े विवाद का केंद्र बनी हुई है, जहां लोकतंत्र के चौथे स्तंभ—पत्रकारिता—को लेकर तीखी टकराव की स्थिति बनी हुई है। इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) के बैनर तले पत्रकार पिछले कई दिनों से धरने पर बैठे हैं, और अब यह आंदोलन 8वें दिन में प्रवेश कर चुका है।
धरना स्थल पर माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। पत्रकारों का आरोप है कि प्रशासनिक तंत्र न सिर्फ उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रहा है, बल्कि सरकार भी इस पूरे मामले में चुप्पी साधे हुए है।
क्या है विवाद की जड़?
यह पूरा मामला जैसलमेर में तैनात रहे एक पूर्व कलेक्टर और उनकी कार्यशैली से जुड़ा है। पत्रकार संगठन का आरोप है कि कलेक्टर रहते हुए प्रताप सिंह नाथावत ने नियमों के खिलाफ जाकर निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए जमीन आवंटन किए।
जब इन कथित अनियमितताओं को लेकर खबरें प्रकाशित की गईं, तो आरोप है कि इसके प्रतिशोध में एक पत्रकार की आजीविका पर चोट पहुंचाई गई।
रेस्टोरेंट तोड़ने से बढ़ा विवाद
IFWJ के प्रदेश अध्यक्ष उपेंद्र सिंह राठौड़ ने आरोप लगाया कि वे वर्ष 2004 से जैसलमेर के डेजर्ट क्लब में ‘स्वाद रेस्टोरेंट’ चला रहे थे, जिसके लिए उन्होंने दिसंबर 2025 तक का किराया भी अग्रिम जमा कर रखा था।
इसके बावजूद प्रशासन ने कथित तौर पर नियमों की अनदेखी करते हुए रेस्टोरेंट को सीज कर दिया और बाद में उसे ध्वस्त कर दिया।
राठौड़ का दावा है कि इस कार्रवाई से उन्हें करीब 1 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है।
उनका कहना है कि यह कदम सिर्फ एक कारोबारी कार्रवाई नहीं, बल्कि एक पत्रकार पर दबाव बनाने और उसे चुप कराने की कोशिश थी।
धरना क्यों और किसलिए?
इन्हीं मुद्दों को लेकर 29 मार्च से जयपुर के शहीद स्मारक पर पत्रकारों का धरना जारी है। उनकी प्रमुख मांगें हैं—
- संबंधित अधिकारी को निलंबित किया जाए
- आर्थिक नुकसान की भरपाई की जाए
- पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो
हालांकि, अब तक सरकार की ओर से किसी ठोस वार्ता की पहल नहीं होने से पत्रकारों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
सरकार पर सीधे आरोप
धरना स्थल पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपेंद्र सिंह राठौड़ ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा—
“हम पहले दिन से बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन सरकार खुद इस आंदोलन को खत्म नहीं करना चाहती।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि संबंधित कलेक्टर का तबादला जरूर किया गया, लेकिन कार्रवाई के बजाय उन्हें वित्त विभाग में अहम जिम्मेदारी दे दी गई, जो सरकार की “जीरो टॉलरेंस” नीति पर सवाल खड़े करता है।
जनता और पर्यावरण प्रेमियों का भी विरोध
संगठन का दावा है कि इस मामले को लेकर न सिर्फ पत्रकार, बल्कि आम जनता और पर्यावरण प्रेमी भी नाराज हैं।
कथित भूमि आवंटन और कार्रवाई को लेकर कई वर्गों में असंतोष देखा जा रहा है।
अब दिल्ली तक जाएगी लड़ाई
मामले को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाने की तैयारी भी शुरू हो चुकी है। जानकारी के मुताबिक, उपेंद्र सिंह राठौड़ 5 और 6 अप्रैल को दिल्ली में आयोजित बैठक में शामिल होंगे, जहां इस मुद्दे को देशभर के पदाधिकारियों के साथ उठाया जाएगा और प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचाया जाएगा।
धरने की रणनीति और संगठन
धरना लगातार जारी रखने के लिए संगठन ने अलग-अलग जिलों को जिम्मेदारी दी है। इसी क्रम में सिरोही जिले के पत्रकारों को धरने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसका नेतृत्व जोधपुर संभाग प्रभारी विक्रम सिंह करणोत कर रहे हैं।
धरना स्थल पर प्रतिदिन पत्रकारों की उपस्थिति बनी हुई है, जो इस आंदोलन को लंबा खींचने के संकेत दे रही है।
बड़ा सवाल
यह पूरा मामला अब सिर्फ एक प्रशासनिक कार्रवाई या एक पत्रकार के नुकसान तक सीमित नहीं रह गया है।
👉 क्या यह पत्रकारिता की आवाज दबाने की कोशिश है?
👉 या फिर प्रशासनिक कार्रवाई को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है?
इन सवालों के जवाब अभी साफ नहीं हैं, लेकिन इतना तय है कि यह विवाद राजस्थान की राजनीति, प्रशासन और मीडिया—तीनों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है।
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