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युवा लेखिका प्रियंका नारायण की किताब ‘किन्नर: सेक्स और सामाजिक स्वीकार्यता’ सबसे अलग

 युवा लेखिका प्रियंका नारायण की किताब ‘किन्नर: सेक्स और सामाजिक स्वीकार्यता’ सबसे अलग

हिंदी में किन्नर समाज को लेकर ज़्यादातर गल्प लिखा गया है, उनकी वास्तविकता को लेकर कम लिखा गया है। हाल में कुछ किताबों का अनुवाद अंग्रेज़ी से हुआ है जिसमें प्रसिद्ध किन्नर ऐक्टिविस्ट लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की की किताब, मनोबी बन्द्योपाध्याय की किताबों का ध्यान आता है। हाल में देवदत्त पट्टनायक के उपन्यास ‘प्रेग्नेंट फादर’ का हिंदी अनुवाद भी आया है। युवा लेखिका प्रियंका नारायण की किताब ‘किन्नर: सेक्स और सामाजिक स्वीकार्यता’ इनमें सबसे अलग है। सबसे उल्लेखनीय बात यह कि उस युवा लेखिका ने गल्प का नहीं शोध का रास्ता पकड़ा है। लेखिका ने सबसे पहले लैंगिक अवधारणा को समझने का प्रयास किया है, किन्नर का जीव वैज्ञानिक अध्ययन किया है, किन्नर को लेकर पौराणिक अवधारणा का अध्ययन प्रस्तुत किया है। यही नहीं समकालीन समाज में किन्नर समाज के लोगों को कितना संघर्ष करना पड़ता है, सामाजिक स्वीकार्यता के बिना उनके जीवन में कितना अधूरापन होता है इसको भी दिखाने का प्रयास किया गया है। लेखिका ने किताब में थर्ड जेंडर के अनेक व्यक्तियों से भी बात की है और पाठकों से उनके अनुभवों को साझा किया है। किताब में मनोबी बंदयोपाध्याय के साथ एक अच्छी बातचीत है। वह पश्चिम बंगाल में एक कॉलेज की प्रिंसिपल हैं लेकिन इसके कारण समाज में उनको लेकर धारणा बहुत बदल गई हो ऐसा नहीं है। यही हाल लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी का है। उन्होंने किन्नर समाज की पहचान को सम्मान दिलाने के लिए लम्बा संघर्ष किया। वह आज किन्नर अखाड़े की प्रमुख हैं। विदुषी हैं लेकिन समाज उनसे आशीर्वाद तो लेता है अपने बराबर नहीं बिठाता।
हालात में बदलाव हो रहा है। किताब में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब किन्नर समाज के लोगों को समाज ने अपनाया, अपने प्रतिनिधित्व की ज़िम्मेदारी दी। लेकिन दिल्ली अभी भी दूर है। किताब आदि काल से लेकर आज तक के अनेक उदाहरणों के माध्यम से उस समाज की ऐतिहासिकता और उसकी समकालीन वास्तविकता से हमारा बहुत अच्छा परिचय करवाती है। दो सौ पेज की यह किताब हर उस पाठक को पढ़ना चाहिए जो किन्नर समाज के बारे में जानना चाहता है, उनके ऊपर शोध की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।
संदर्भ ग्रंथों की सूची किताब को प्रामाणिक बना देती है।
प्रियंका नारायण ने अपनी पहली ही पुस्तक में एक अछूता विषय उठाया है। इसके लिए उनका साधुवाद। पुस्तक का प्रकाशन वाणी प्रकाशन ने किया है।

प्रभात रंजन

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