• August 11, 2022
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75 साल पुराने अखवार में 350 पत्रकार होने के बाद भी सम्पादकीय लिखवाया जाता है बाहर से

 75 साल पुराने अखवार में 350 पत्रकार होने के बाद भी सम्पादकीय लिखवाया जाता है बाहर से
इंदौर से प्रकाशित बहु संस्करणीय अखबार ‘नईदुनिया’  75 बरस का हो गया है। पांच साल पहले इस अखबार के सात दशक पूरे होने पर लिखी यह पोस्ट फेसबुक के सौजन्य से फिर सामने आ गई। हालांकि पिछले पांच सालों के दौरान इस अखबार ने अपने पतन की नई और शर्मनाक ऊंचाइयों को छुआ है, लेकिन उनका जिक्र किए बगैर इस पोस्ट का पुनर्चेपण कर रहा हूँ।

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नईदुनिया के सात दशक

नईदुनिया आज 70 बरस का हो गया। बधाई। एक पाठक के नाते इस अखबार से अपना भी करीब साढ़े चार दशक पुराना नाता है। 8वीं कक्षा में रहते हुए इसे पढ़ना शुरू किया था।

बाद में अपन ने दो पारियों में दो अलग-अलग प्रबंधन के तहत इस अखबार में दिल्ली में रहते हुए लगभग साढ़े तीन साल तक काम भी किया है।

मुझे गर्व है कि इस अखबार का जो महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित कॉलम (संपादकीय) एक जमाने में श्री राजेंद्र माथुर, श्री राहुल बारपुते और श्री रणवीर सक्सेना जैसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ चिंतक-पत्रकार लिखते थे, वही कॉलम मैंने भी कोई चार साल तक ( साढ़े तीन साल नईदुनिया की सेवा में और सात महीने तक नईदुनिया से बाहर रहते हुए) लिखा और अधिकतम आजादी के साथ लिखा।

इसी गौरव बोध के साथ मुझे अफसोस इस बात का है कि जिस संस्थान में मुझे इतना प्रतिष्ठापूर्ण काम करने का अवसर मिला उसी संस्थान के मौजूदा प्रबंधन के खिलाफ इस समय मुझे न चाहते हुए भी अदालत में संघर्ष करना पड़ रहा है। हालांकि इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर न तो मैं जिम्मेदार हूं और न ही प्रबंधन।

यह अप्रिय स्थिति आई है डेढ़ साल पहले तक इसी अखबार के प्रधान संपादक रहे भ्रष्ट और निकृष्ट श्रवण गर्ग की बदमिजाजी, खुदगर्जी और उनके निहित स्वार्थों के चलते। हालांकि यह और बात है डेढ़ वर्ष पूर्व श्रवण गर्ग को भी बेआबरू होकर नईदुनिया से बाहर का रास्ता देखना पडा।

श्रवण गर्ग ने नईदुनिया में अपने तीन वर्ष के कार्यकाल में विभिन्न संस्करणों में कार्यरत लगभग दो सौ लोगों की नौकरी से खिलवाड़ किया या उन्हें अपनी परपीड़क मानसिकता के चलते तरह-तरह से परेशान किया, जिनमें से कुछ लोग तो मेरी ही तरह अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं। नईदुनिया के पूर्व प्रबंधन के दौर में ऐसी नौबत कभी नहीं आई थी।

बहरहाल, यह अखबार खबरों की गुणवत्ता, भाषा के स्तर और विश्वसनीयता के मामले में तेज कदमों से पतन की दिशा में कुलांचें भर रहा है। सात संस्करणों वाले इस अखबार में लगभग साढ़े तीन सौ पत्रकार कार्यरत हैं लेकिन अखबार को अपना संपादकीय लेख बाहरी व्यक्ति से लिखवाना पड़ रहा है। किसी भी अखबार के लिए इससे अधिक शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है!

यह स्थिति इस बात का आभास कराने के लिए भी काफी है कि अखबार में कार्यरत पदनामधारी संपादक और उनके समकक्ष लोग कितने काबिल और पेशेवर हैं। इस अखबार की पतनगाथा से जुड़े किस्से तो और भी हैं लेकिन उनका जिक्र फिर कभी।

अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार 


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