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लखनऊ की पत्रकारिता का अवार्ड है ये शेरनी !

 लखनऊ की पत्रकारिता का अवार्ड है ये शेरनी !

लखनऊ की पत्रकारिता का अवार्ड है ये शेरनी !

गले में माला पहने , कंधे पर शॉल डाले , हाथ में अवार्ड लिए, अर्ध गोला बनाकर फोटो खिचवाते झुंड। सोशल मीडिया पर आएदिन ऐसी तस्वीरें देखकर आप हंसते हैं। कॉमेडी शो जैसै अवार्ड समारोहों में सम्मानित इन क़तारों को पत्रकारिता की उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित करने का शग़ल मजाक इसलिए समझा जाता है क्योंकि सम्मानित कथित पत्रकार कहां खबर लिखते हैं ? इन्होंने कहां-कहां पत्रकारिता की सेवाएं दीं? इनकी खबरें कहां छपती हैं? इनकी ख़बरें अतीत में कहां दिखती थीं? वर्तमान में कहां दिखती है़ंं? इनको कौन पढ़ता है ? इसकी पत्रकारिता की क्या सेवाएं हैं? इनकी पत्रकारिता का ग्राउंड क्या है ? किस किस्म की खबरों के लिए और किस तरह की उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए इन्हें अवार्ड दिया रहा है ? ये किसी को नहीं मालुम !
जब से सोशल मीडिया आम हुआ है तब से ऐसे तमाशे हर क्षेत्र में खूब होने लगे हैं। कोई सम्मानित होने के लिए कवि बन जाता है कोई समाजसेवी तो कोई कुछ और। पत्रकार का टैग लगाना सबसे आसान है।
इन बातों का मतलब ये कतई नहीं कि लखनऊ में वास्तविक सम्मानित पत्रकारों की कमी हैं। यहां ज़मीनी पत्रकारिता को समर्पित क़ाबिल पत्रकारों का खजाना भी है।
यहां ऐसे पत्रकारों की कमी नहीं जिनपर पत्रकारिता को नाज़ (गर्व) है। जिन्हें भले ही अवार्ड नहीं मिलता पर ये ख़ुद अपने आप में पत्रकारिता का जीता-जागता अवार्ड हैं।

ये तस्वीर देखिए ! टूटे हाथ वाली एक महिला की इस पिक्चर में लखनऊ की पत्रकारिता का सम्मान छिपा है। महिला सशक्तिकरण की असलियत है ये तस्वीर। पत्रकारिता शिव है तो ये महिला पत्रकार पार्वती हैं। यदि पत्रकारिता कमल है और कमल पर विराजमान सरस्वती यदि ज्ञान हैं तो ये महिला कमल का स्वरूप हैं। पत्रकारिता की जटिलताएं, अभाव, संघर्ष और तकलीफें अगर महिषासुर है तो इसे हराने वाली ये शेरनी पत्रकारिता की महिषासुरमर्दिनी हैं !

बात हो रही है लखनऊ की जानी-पहचानी महिला पत्रकार मुकुल मिश्रा की। इन्होंने पत्रकारिता पर अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया है। ये क़रीब तीन दशक से लखनऊ में पत्रकारिता में सक्रिय हैं। तीस वर्षों में तीस दिन भी शायद ऐसे नहीं गुजरे हों जब इन्होंने अपने अखबार में अपनी बीट की खबर फाइल न की हो। मुकुल मिश्रा दीदी ने अलग-अलग प्रतिष्ठित अखबारों में भले ही कम वेतन पर नौकरी की, अधिक पैसा नहीं कमाया पर इनके पास सम्मान की बेशुमार दौलत है।
आज के वाक़िए ने तो कमाल कर दिया। इस वाक़िए के बाद मुकुल दी को पत्रकारिता की शेरनी का खिताब मिले तो आश्चर्य नहीं होगा।
ये दशकों से राज्य मुख्यालय की खबरें कवर करती रही हैं। विधानसभा सत्र भी एक अर्से से कवर करती है। आजकल यूपी विधानसभा का मानसून सत्र चल रहा है। हमेशा की तरह सत्र की पल-पल की खबर पर नजर रखना और उसे लिखने में इनका कोई सानी नहीं। कई पुरुष पत्रकार तो विधानसभा की दिनभर की कार्रवाई की खबर लिखने मे इस महिला पत्रकार से मदद मांगते हैं।
आज यूपी विधानसभा मानसून सत्र के दूसरे दिन कवरेज के लिए मुकुल डालीबाग स्थित अपने आवास से विधानभवन जाने के लिए सुबह स्कूटी से निकलीं। घर से कुछ दूर पुराने डीजीपी आफिस के करीब इनकी स्कूटी स्लिप हुई और ये गिर पड़ी। हाथ में गंभीर चोट आ गई। साथी पत्रकार नीरज श्रीवास्तव जी इनको सिविल अस्पताल ले गए, जहां एक्सरे हुआ और पता चला हाथ की हड्डी टूट गई है। कच्चा प्लास्टर चढ़ा। अमुमन ऐसी हालत में पेशेंट दर्द से कराहता है और अस्पताल में भर्ती हो जाता है। मां दुर्गा की भक्त मुकुल प्लास्टर चढ़ने के फौरन बाद टूटा हाथ लेकर विधानसभा आ गई। पत्रकार दीर्घा में बैठकर विधानसभा की कार्रवाई कवर की और साथी पत्रकार योगेश श्रीवास्तव की मदद से स्टोरी फाइल की।
पत्रकारों और विधानसभा के कर्मचारियों ने कहा सैल्यूट।
– नवेद शिकोह

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