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जनसत्ता के एक और डेस्क वाले की भड़ास

 जनसत्ता के एक और डेस्क वाले की भड़ास

जनसत्ता के एक और डेस्क वाले की भड़ास

जनसत्ता दिल्ली में डेस्क पर काम करने की गजब आजादी थी। मैं हमेंशा इस आजादी को अराजकता की हद तक की आजादी कहता था। इस आजादी का मैंने कभी इरादतन दुरुपयोग तो नहीं किया पर मजा खूब लिया। प्रभाष जोशी के बाद वह स्थिति नहीं रही और मेरा मन उचटता गया अंततः मैंने जनसत्ता की नौकरी छोड़ दी हालांकि फिर भी काफी दिन टिका रहा। दरअसल वहां पत्रकारिता की संभावनाएं कम होते-होते वह नौकरी हो गई थी और मुझे नौकरी की जरूरत कभी नहीं थी।

पत्रकारिता की आजादी संस्थान नहीं संपादक देता है यह भी तय हो चला था और अपन राम को बहुत जल्दी समझ में आ गया था कि गलत फंस गये हो , निकलो यहां से। बाद की कहानी लिखता रहा हूं पर आज साथी Ganesh Jha ने अपनी अखबार यात्रा की 18वीं किस्त में जो लिखा है वह भी जनसत्ता की कहानी में दर्ज होना चाहिए। आप भी पढ़िए, हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास को जानिये समझिए। पढ़ना चाहें तो गणेश झा की पुरानी 17 किस्तें भी पढ़ डालिए, अच्छा लिख रहे हैं।

बंबई जनसत्ता में काम शुरू किए चंद रोज ही हुए थे कि मुझे एक बड़ी खबर हाथ लग गई। उस समय शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। किन्हीं राजनैतिक कारणों से उन्होंने एक अजीब सा निर्णय ले लिया। विधानसभा में बाकायदा एक प्रस्ताव पास करा लिया गया कि राज्य के तमाम राष्ट्रीयकृत बैंकों में राज्य सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और निगमों आदि के जितने भी खाते चल रहे हैं उन सबसे सारे के सारे पैसे निकालकर महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक की शाखाओं में जमा करा दिए जाएं। बड़ा अजीब निर्णय था और इसका बड़ा ही दूरगामी असर होने वाला था।

मैंने इस खबर को दिल्ली जनसत्ता को भेजने का निर्णय़ लिया। मैं वहां कोई रिपोर्टर नहीं था। मैं तो डेस्क का आदमी था और डेस्क पर ही रखा गया था। पर मैंने अपने तई यह निर्णय लिया कि यह खबर राष्ट्रीय संस्करण के लायक है इसलिए इस दिल्ली भेज दी जानी चाहिए। हालांकि यह जिम्मेदारी तो वहां के स्थानीय संपादक राहुलदेवजी की थी। यह तय करना भी उनका ही काम था कि महाराष्ट्र में आज कौन-कौन सी खबर है और उसमें से कौन-कौन सी खबर राष्ट्रीय कलेवर वाली है और दिल्ली संस्करण के लायक है। पर तब तक वहां रहते हुए उनमें मैंने कभी ऐसी कोई रुचि नहीं देखी थी।

जनसत्ता का बंबई संस्करण इस खबर को काफी अंडरप्ले करते हुए एक साधारण खबर के रूप में बिल्कुल साथारण डिस्प्ले देकर छाप रहा था। मैंने बिना किसी से कुछ पूछे उस खबर को नए अंदाज में रोमन में चार कॉलम साइज में लिखा और इंडियन एक्सप्रेस के टेलीप्रिंटर नेटवर्क से दिल्ली भेज दी। थोड़ी ही देर में वह खबर कंपोज होकर दिल्ली संस्करण के डाक संस्करणों में तो छपी ही, बंबई भी आ गई। दिल्ली के डाक संस्करणों में वह खबर पहले पेज का बॉटमस्प्रेड थी।

बंबई में पहले पेज पर सिंगल कॉलम में छापी गई। दिल्ली से जैसे ही वह खबर आई किसी ने उसकी ब्रोमाइड दूसरी खबरों के साथ राहुलजी की मेज पर रख दी। दिल्ली डेस्क ने उस खबर में मेरी बाईलाइन लगा दी थी। खबर देखते ही राहुलजी ने मुझे अपनी केबिन में बुलाया और बरस पड़े। राहुलजी ने कहा, “आपने यह खबर दिल्ली कैसे और क्यों भेज दी। मैं तो इसपर एडिट लिखनेवाला था।“ मैंने उनसे कहा कि यह खबर तो यहां सिंगल कॉलम में छप रही है। यह एक बड़ी नेशनल खबर है इसलिए मैने इसे दिल्ली भेज दी। मुझे डांट-डपट कर गलत ठहराकर राहुलजी शांत हो गए। फिर मेरी लिखी वह खबर उन्होंने वहां भी छापने को कह दिया। खबर छप गई और बाईलाईन ही छपी। पर इस घटना से मैं राहुलजी की नजरों में चढ़ जरूर गया।

मेरे प्रति इस चिढ़ को उन्होंने आखिर तक यानी जब तक वे एक्सप्रेस समूह में रहे तब तक याद रखा और मुझे समय-समय पर कुछ न कुछ नुकसान पहुंचाते ही रहे। इसी को कहते हैं किसी बात की गांठ बांध लेना। यहां यह साफ कर देना गलत नहीं होगा कि जब तक मैं बंबई जनसत्ता में रहा राहुल जी ने मेरी जानकारी में एक बार भी एडिट (संपादकीय) नहीं लिखा। जनसत्ता बंबई का संपादकीय पेज तो हमेशा दिल्ली वाला ही जस का तस जाया करता था। मेरे दिल्ली आ जाने के बाद अगर राहुलजी ने कभी एडिट लिखा हो तो वह मुझे नहीं मालूम।

संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

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