छत्तीसगढ़ की राजनीति में शराब घोटाले ने एक समय तूफ़ान मचा दिया था। पिछली विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने इसी मुद्दे को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। चौक-चौराहों पर प्रदर्शन, सरकार विरोधी नारे, भारी प्रचार— “शराब से जनता लूटी गई, पियक्कड़ों तक को ठगा गया!” — ऐसे आरोपों की गूँज हर जगह सुनाई दी।
इस जनाक्रोश की आँच इतनी तेज़ थी कि कांग्रेस की सत्ता की दीवारें ढह गईं और बीजेपी सत्ता में आ गई।
लेकिन सरकार बदलने के बाद…?
सत्तारोहण के बाद जनता को उम्मीद थी कि घोटालेबाजों पर बिजली की तरह गाज गिरेगी। पर हकीकत में न तो शराब घोटाले में, न कोयला प्रकरण में, और न ही महादेव ऐप जैसे चर्चित मामलों में कोई बड़ी और साफ़ कार्रवाई होती दिखी।
बीजेपी के नेताओं ने कांग्रेस सरकार के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप ज़रूर दोहराए, मगर जिन सरकारी अधिकारियों पर इन घोटालों को अंजाम देने के आरोप थे, वे ज्यों-के-त्यों अपनी कुर्सियों पर जमे रहे।
यहां तक कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता ननकीराम कंवर ने सैकड़ों पत्र लिखकर भ्रष्ट अफसरों पर कार्रवाई की माँग की, मगर उनकी चिट्ठियाँ धूल फाँकती रहीं। जिन अफसरों के खिलाफ वे आवाज़ उठा रहे थे, वे सत्ता के करीबी और ‘अछूत’ माने जाते रहे।
अब इस मुद्दे पर बीजेपी के ही नेता नरेश चंद्र गुप्ता ने अपनी ही सरकार को घेर लिया। जब शराब घोटाले में आबकारी अधिकारियों के खिलाफ ACB-EOW ने चालान दाखिल किया तो गुप्ता ने साफ़-साफ़ कह दिया:
“बीजेपी ने चुनाव के वक्त जनता से वादा किया था कि शराब घोटाले की तह तक जाकर दोषियों को सज़ा दी जाएगी। अब यह मामला CBI को सौंपा जाए, वरना असली मास्टरमाइंड और बाकी भ्रष्टाचारी बच निकलेंगे।”
इसी बीच एक ऐसा फैसला आया जिसने सभी को चौंका दिया—सरकार ने एक झटके में 22 आबकारी अधिकारियों को निलंबित कर दिया।
EOW ने इस घोटाले में 29 अधिकारियों के खिलाफ करीब 2300 पन्नों का चालान पेश किया। इनमें से कुछ अधिकारी रिटायर हो चुके हैं, मगर जिनके नाम चालान में दर्ज हुए, वे फिलहाल सस्पेंड कर दिए गए हैं।
शुरुआती जांच में यह घोटाला करीब 2100 करोड़ रुपये का बताया गया था, जो अब बढ़कर लगभग 3200 करोड़ रुपये तक पहुँच गया है।
जांच के मुताबिक 2019 से 2023 के बीच अधिकारियों की मिलीभगत से डुप्लीकेट होलोग्राम लगाकर नकली शराब दुकानों तक भेजी जाती रही, जिससे मोटा मुनाफ़ा कमाया गया।
अब सवाल यही है—
क्या ये निलंबित अधिकारी जल्द ही किसी दरबार में जाकर ‘चरण दर्शन’ और दक्षिणा चढ़ाकर मामले को रफा-दफा करा लेंगे?
क्या उन्हें कोई रहस्यमयी ‘संजीवनी’ मिल जाएगी?
या फिर विष्णु देव साय सरकार अपने घोषित सिद्धांत “भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस” पर डटी रहेगी और किसी दरबार, दबाव या दलील की परवाह किए बिना न्याय करेगी?
पूरा प्रदेश अब यही देख रहा है कि बीजेपी सरकार के लिए उसूल बड़ा है या दरबार का वसूल।
छत्तीसगढ़ से पत्रकार परेटन लाल यादव
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