हरिद्वार। तीर्थनगरी हरिद्वार के प्रेमनगर स्थित आश्रम में आयोजित आयुर्वेद कुंभ का समापन भले ही भव्यता, भीड़ और आयोजकीय सफलता के साथ हुआ हो, लेकिन समापन समारोह के दौरान घटित एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने पूरे आयोजन की सकारात्मक छवि पर सवाल खड़े कर दिए। कार्यक्रम के अंतिम दिन लिफाफे को लेकर दो पत्रकारों के बीच हुए विवाद और हाथापाई ने न केवल आयोजकों को असहज किया, बल्कि पत्रकारिता की मर्यादा और साख पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए।
लिफाफे को लेकर शुरू हुआ विवाद
प्रत्यक्षदर्शियों और सूत्रों के अनुसार, आयुर्वेद कुंभ के समापन अवसर पर देशभर से आए आयुर्वेद विशेषज्ञों, वैद्यों, संतों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में मीडिया प्रतिनिधि भी मौजूद थे। समापन कार्यक्रम के बाद जब मंच के आसपास सम्मान और औपचारिकताओं का दौर चल रहा था, उसी दौरान लिफाफे और कथित गिफ्ट वितरण को लेकर कुछ पत्रकारों में कहासुनी शुरू हो गई।
बताया जा रहा है कि इसी दौरान पत्रकार गणेश भट्ट और एक समाचार पत्र से जुड़े पत्रकार रोहित वर्मा के बीच तीखी बहस हो गई। बहस देखते ही देखते इतनी बढ़ गई कि गुस्से में आकर गणेश भट्ट द्वारा रोहित वर्मा को थप्पड़ मारे जाने का आरोप सामने आया। इस घटना के बाद कुछ समय के लिए कार्यक्रम स्थल पर अफरा-तफरी मच गई।
मंच के पास बनी तनावपूर्ण स्थिति
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि दोनों पत्रकारों के बीच पहले ऊंची आवाज में बहस हुई, फिर धक्का-मुक्की और हाथापाई की स्थिति बन गई। मौके पर मौजूद अन्य पत्रकारों, आश्रम से जुड़े सेवकों और आयोजकों ने किसी तरह बीच-बचाव कर मामला शांत कराया।
घटना जिस स्थान पर हुई, वह मंच और अतिथियों के बैठने के क्षेत्र के पास था, जिससे संत समाज और विशिष्ट अतिथियों के सामने यह दृश्य और भी शर्मनाक बन गया। कई श्रद्धालु और आगंतुक इस व्यवहार से हैरान नजर आए।
संत समाज और आयोजकों में नाराजगी
आश्रम से जुड़े संतों और आयुर्वेद कुंभ के आयोजकों ने इस घटना को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उनका कहना है कि
“आयुर्वेद कुंभ का उद्देश्य स्वस्थ जीवनशैली, भारतीय चिकित्सा पद्धति और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देना था, लेकिन कुछ लोगों के व्यक्तिगत आचरण ने पूरे आयोजन की गरिमा को ठेस पहुंचाई।”
कुछ संतों ने यह भी कहा कि यदि पत्रकारिता के नाम पर इस तरह का व्यवहार होता रहा, तो भविष्य में धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में मीडिया को लेकर आयोजकों को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ेगी।
श्रद्धालुओं में भी दिखी नाराजगी
कार्यक्रम में दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं और प्रतिभागियों ने भी इस घटनाक्रम पर नाराजगी जताई। कई लोगों का कहना था कि जिनसे समाज को आईना दिखाने की उम्मीद की जाती है, वही लोग सार्वजनिक मंच पर इस तरह का व्यवहार करें, तो यह चिंता का विषय है।
एक श्रद्धालु ने कहा,
“हम यहां आयुर्वेद और धर्म की बात सुनने आए थे, लेकिन पत्रकारों की लड़ाई देखकर मन खिन्न हो गया।”
पत्रकारिता की साख पर फिर सवाल
यह घटना ऐसे समय पर सामने आई है जब हरिद्वार में पहले से ही कथित लिफाफा पत्रकारिता को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। प्रेमनगर आश्रम की इस घटना ने उन चर्चाओं को और बल दे दिया है। वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि कुछ लोग केवल पहचान पत्र और मोबाइल लेकर खुद को पत्रकार बताने लगे हैं, जबकि न तो उन्हें पेशे की गरिमा का ज्ञान है और न ही जिम्मेदारी का एहसास।
उनका कहना है कि ऐसे तत्वों की वजह से ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों की छवि भी प्रभावित हो रही है, जो समाज के लिए कहीं ज्यादा खतरनाक स्थिति है।
लिफाफे के लिए थप्पड़! प्रेमनगर आश्रम में आयुर्वेद कुंभ के समापन पर शर्मनाक दृश्य pic.twitter.com/HfuacGfCUo
— bhadas2media (@bhadas2media) December 27, 2025
प्रेस संगठनों में चर्चा, कार्रवाई की मांग
घटना के बाद स्थानीय पत्रकार संगठनों और प्रेस यूनियनों में भी इस मामले को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। कई वरिष्ठ पत्रकारों ने मांग की है कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।
हालांकि, समाचार लिखे जाने तक इस मामले में किसी भी पक्ष की ओर से औपचारिक पुलिस शिकायत दर्ज होने की पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन मामला पत्रकारिता जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है।
आयुर्वेद कुंभ की उपलब्धियां, विवाद ने छीनी चमक
गौरतलब है कि प्रेमनगर आश्रम में आयोजित आयुर्वेद कुंभ में आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार, शोध, प्राकृतिक चिकित्सा और जीवनशैली से जुड़े कई महत्वपूर्ण सत्र आयोजित किए गए। देशभर से आए विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए और बड़ी संख्या में लोगों ने इसका लाभ उठाया।
लेकिन दुर्भाग्यवश, समापन के दिन हुआ यह विवाद उन सभी सकारात्मक उपलब्धियों पर भारी पड़ता नजर आया।
प्रेमनगर आश्रम में आयुर्वेद कुंभ के समापन के दौरान हुई यह घटना केवल दो पत्रकारों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह पत्रकारिता के गिरते स्तर और लिफाफा संस्कृति की एक गंभीर झलक भी है। जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता से जुड़े जिम्मेदार लोग आत्ममंथन करें और ऐसे तत्वों को अलग करें, जो इस पेशे की गरिमा को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
