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एक चैनलिया दलाल का दावा इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति के बुझाए जाने को सही ठहरा रहा है।

 एक चैनलिया दलाल का दावा इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति के बुझाए जाने को सही ठहरा रहा है।

एक चैनलिया दलाल का वीडियो देखा जिसमें वह अमर जवान ज्योति के बुझाए जाने को सही ठहरा रहा है। उसका तर्क ये है कि अमर जवान ज्योति इंडिया गेट पर जल रही थी और इंडिया गेट गुलामी का प्रतीक है।

अब ऐसे दलालों से कोई पूछे कि फिर आपने इंडिया गेट क्यों नहीं ढहाया? अमर जवान ज्योति 26 जनवरी 1972 को पाकिस्तान युद्ध में शहीद जवानों की याद में जलाई गई थी। एक ऐसा युद्ध जिसमें हमने पाकिस्तान को तोड़ दिया था और मात्र 3000 भारतीय सैनिकों ने 93000 पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण करवा लिया था। ऐसे जांबाजों की याद में जल रही ज्योति क्यों बुझा दी?

उन्हें अंग्रेजों से दिक्कत नहीं है। उनके वैचारिक आका अंग्रेजों की दलाली करते थे। उन्हें भारत के हर मूल्य को मिटाना है।

तर्क है कि वॉर मेमोरियल बना है तो वहां भी एक ज्योति जलाई गई है। दो-ज्योति का रखरखाव महंगा पड़ता, इसलिए ऐसा किया गया? क्या 50 साल से जल रही ज्योति का रखरखाव मोदी के कपड़ों, मेकअप, और 8000 करोड़ के जहाज से भी महंगा पड़ता? क्या एक दिया 20,000 करोड़ के हवामहल से भी महंगा पड़ रहा था?

तर्क है कि पुरानी ज्योति का नई ज्योति में विलय कर दिया गया। कोई प्रकांड गधा मुझे ये समझाए कि ज्योति का विलय कैसे संभव है? ज्योति कोई पानी है या पार्टी है? क्या आत्माओं का विलय संभव है? क्या भावनाओं का विलय संभव है? क्या आदर, सम्मान, श्रद्धांजलि और देशभक्ति का विलय संभव है?

असल कहानी क्या है वो सुनिए। असल कहानी ये है कि इस देश के मूल्य, इस देश का लोकतंत्र, इस देश का विचार, इस देश के महापुरुष, इस देश के स्वरूप, या कहें कि यह देश जिस व्यवस्था से चलता है, आरएसएस को उससे दिक्कत है। ये दिक्कत उन्हें सौ साल से है। ये दिक्कत सावरकर और गोलवलकर को भी थी, ये दिक्कत भागवत और मोदी को भी है।

ये उस भारत को मिटाना चाहते हैं जो हमारे पुरखों ने बलिदान देकर हमें सौंपा था। ये हर उस ऐतिहासिक चीज को ध्वस्त करेंगे, ये इस देश की शहादत पर भी हमला बोलना शुरू कर चुके हैं।

1971 का पाकिस्तान युद्ध भारतीय सैन्य इतिहास का गौरव था, जिसकी याद में जल रही ज्योति को बुझा दिया गया और अब कॉरपोरेट मीडिया के भड़ुवे इस दुष्कृत्य को सही ठहरा रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि हमारे देश की जनता ने अभी अपना विवेक इस कदर नहीं खोया होगा कि अपने लिए शहीद हुए लोगों के अपमान को भी सही ठहराने लगे। इस दुनिया में जीवन दे देने से बड़ा कोई बलिदान, कोई त्याग नहीं होता।

कृष्णा कान्त वरिष्ठ पत्रकार

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