प्रचारकों की पत्रकारिता

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सब कुछ जानते हुए भी मैं अभी तक डॉ. वेद प्रताप वैदिक को झेल रहा था। उनके व्हाट्सऐप्प ग्रुप में था। पर आज उन्होंने एक खबर दी है, “मुंबई के दैनिक अखबार आफ्टरनून वॉइस की ओर से डॉ. वेदप्रताप वैदिक को ‘न्यूजमेकर अचीवर्स सम्मान’ प्रदान करते हुए महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस व अखबार की संपादक डॉ. वैदेही।” (मुझे इस पुरस्कार को देने-लेने दोनों का मतलब समझ में नहीं आया। भले ही यह मेरी नालायकी या अज्ञानता हो।) इसे फिर भी इसे झेला जा सकता था।

आज ही उन्होंने लिखा है, उदयपुर में कांग्रेस का चिंतन-शिविर आयोजित किया जा रहा है। सबसे आश्चर्य तो मुझे यह जानकर हुआ कि इस जमावड़े का नाम चिंतन-शिविर रखा गया है। हमारे नेता और चिंतन! इन दो शब्दों की यह जोड़ी तो बिल्कुल बेमेल है। भला, नेताओं का चिंतन से क्या लेना-देना? छोटी-मोटी प्रांतीय पार्टियों की बात जाने दें, देश की अखिल भारतीय पार्टियों के नेताओं में चिंतनशील नेता कितने है? क्या उन्होंने गांधी, नेहरु, जयप्रकाश, लोहिया, नरेंद्रदेव की तरह कभी कोई ग्रंथ लिखा है? अरे लिखना तो दूर, वे बताएंगे कि ऐसे चिंतनशील ग्रंथों को उन्होंने पढ़ा तक नहीं है।

वैसे तो यह बहुत ही सामान्य तथ्य है और जाहिर है वे सभी नेताओं की बात कर रहे हैं। लेकिन जिन चिन्तक नेताओं की बात की है उनमें क्या कोई कभी नरेन्द्र मोदी जैसे सफल प्रधानमंत्री बन पाया? अगर नहीं तो चिन्तन की क्या जरूरत है? इस पर बात हो सकती है और वैदिक जी ने जो लिखा है वह बेमतलब नहीं है लेकिन मुद्दा यही है कि वे यही बात नरेन्द्र मोदी के लिए लिख सकेंगे? लिखेंगे – तो मैं क्यों झेलूं।

और इस तरह आज मैं ग्रुप से बाहर हो गया।

संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

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