भारतीय टीवी न्यूज़ मीडिया… जो कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाती थी, आजकल “सायरन पत्रकारिता” का पर्याय बनती जा रही है। टीवी स्क्रीन पर चमकती Breaking News की लाल पट्टी, बैकग्राउंड में बजता तेज़ सायरन, एंकर की ऊँची आवाज़ और स्टूडियो में बैठे मेहमानों की आपसी चीख-पुकार — ये सब मिलकर आज की न्यूज़ को सूचना कम और मनोरंजन ज़्यादा बना रहे हैं।
कभी पत्रकारिता का मकसद था जनता तक सच पहुँचाना, सत्ता से सवाल पूछना और समाज को जागरूक करना। लेकिन आज कई बड़े चैनल जैसे Aaj Tak, Republic Bharat, Zee News और News18 India की प्राइम टाइम डिबेट्स को देखिए — ऐसा लगता है जैसे कोई न्यूज़ शो नहीं बल्कि एक रियलिटी शो चल रहा हो।
स्टूडियो में बैठे एंकर खुद जज, वकील और जल्लाद की भूमिका निभाते नज़र आते हैं। किसी घटना की पूरी जानकारी आने से पहले ही टीवी स्क्रीन पर “देशद्रोही कौन?”, “किसने किया राष्ट्र के साथ विश्वासघात?” जैसे सवाल गूँजने लगते हैं। बैकग्राउंड में सायरन बजता है, ग्राफिक्स ऐसे चलते हैं जैसे कोई युद्ध शुरू होने वाला हो — और दर्शक के मन में डर, गुस्सा और उत्तेजना पैदा कर दी जाती है।
यहाँ सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता का काम जनता को सूचना देना है या भावनाओं को भड़काना?
टीआरपी की इस अंधी दौड़ में न्यूज़ चैनल अब खबरों को नहीं, बल्कि नैरेटिव को बेच रहे हैं। किसी भी मुद्दे को इस तरह पेश किया जाता है कि दर्शक तुरंत प्रतिक्रिया दे — सोचने का समय ही न मिले। यही कारण है कि छोटी-सी घटना को भी “राष्ट्रीय संकट” बनाकर दिखाया जाता है।
मान लीजिए किसी शहर में मामूली विवाद हुआ। पहले पुलिस जाँच करेगी, प्रशासन बयान देगा, तथ्यों की पुष्टि होगी — लेकिन टीवी मीडिया के स्टूडियो में फैसला पहले ही सुना दिया जाता है। “ये साज़िश है”, “ये प्लानिंग के तहत हुआ है”, “इसके पीछे कौन है?” जैसे सवालों के साथ एक पूरा ट्रायल टीवी स्क्रीन पर शुरू हो जाता है।
इसे ही आजकल “मीडिया ट्रायल” कहा जाता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस तरह की पत्रकारिता का सीधा असर समाज पर पड़ रहा है। लोग अब खबरों को समझने की बजाय उन्हें महसूस करने लगे हैं — गुस्से, डर और नफरत के रूप में। सोशल मीडिया पर वही भाषा और वही आक्रामकता दिखाई देने लगी है, जो टीवी डिबेट्स में दिखाई जाती है।
कभी पत्रकारिता संयम और संतुलन की मिसाल हुआ करती थी। Ravish Kumar जैसे पत्रकार आज भी तथ्यों और शालीनता के साथ खबरों को प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं, लेकिन शोर-शराबे के इस दौर में उनकी आवाज़ अक्सर दब जाती है।
आज जरूरत है आत्ममंथन की।
टीवी मीडिया को यह समझना होगा कि वह सिर्फ टीआरपी के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए काम कर रही है। हर ब्रेकिंग न्यूज़ को सायरन और धमाकेदार ग्राफिक्स के साथ पेश करना पत्रकारिता नहीं है। दर्शकों को उत्तेजित करना आसान है, लेकिन उन्हें जागरूक करना कठिन।
जब तक न्यूज़ रूम में “पहले दिखाओ, बाद में सोचो” की मानसिकता बनी रहेगी, तब तक पत्रकारिता का स्तर गिरता रहेगा।
भारतीय टीवी मीडिया को मैच्योर होने के लिए अपनी प्राथमिकताओं को बदलना होगा — टीआरपी से ज्यादा सच्चाई को महत्व देना होगा, बहस से ज्यादा संवाद को बढ़ावा देना होगा और सनसनी से ज्यादा संवेदनशीलता को अपनाना होगा।
क्योंकि अगर मीडिया ही सायरन बजाकर उछलकूद करती रही, तो समाज कब शांत होकर सोच पाएगा?
संजय कश्यप -संपादक
