एटा: जिले की कोतवाली नगर पुलिस एक बार फिर विवादों में घिर गई है। पत्रकार पर जानलेवा हमला करने वाले आरोपियों को न केवल थाने से ही जमानत मिल गई, बल्कि पुलिस ने उन पर दर्ज गंभीर धाराओं—विशेषकर भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास)—को भी विलोपित कर दिया। यह पूरा मामला अब पुलिस प्रशासन की मंशा और कार्यशैली पर गहरे सवाल खड़े कर रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, जिन आरोपियों पर एटा, फिरोजाबाद सहित कई जिलों में संगीन आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, उन्हीं पर पत्रकार पर जानलेवा हमले का आरोप भी लगा था। बावजूद इसके, न सिर्फ आरोपियों को थाने से ही जमानत दे दी गई, बल्कि उन पर लगी सबसे अहम धारा 307 को भी हटा दिया गया। इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि पुलिस कहीं न कहीं बाहरी दबाव में काम कर रही है या फिर जानबूझकर अपराधियों को संरक्षण दे रही है।
पत्रकार पर झूठा मुकदमा भी चर्चा में
इसी बीच एएनबी न्यूज के एक पत्रकार पर कथित तौर पर झूठा मुकदमा दर्ज करने का मामला भी सामने आया है। जब पत्रकार ने इस संबंध में कोतवाल से बात की, तो उन्हें जवाब मिला— “जब आपका झूठा मुकदमा लिखा गया है, तो आपके ऊपर भी झूठा मुकदमा दर्ज होगा।” पुलिस अधिकारी के इस कथन से स्पष्ट है कि पत्रकारों के प्रति द्वेषपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है, जो बेहद चिंताजनक है।
जांच पूरी, फिर भी नहीं हुई कार्रवाई
उल्लेखनीय है कि पत्रकार पर हमले की जांच क्षेत्राधिकारी (सीओ सिटी) स्तर से की जा चुकी है और रिपोर्ट भी पुलिस प्रशासन को सौंपी जा चुकी है। फिर भी पुलिस की निष्क्रियता और लगातार टालमटोल से अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं।
भेदभावपूर्ण रवैया बना आक्रोश का कारण
पुलिस की इस भेदभावपूर्ण कार्यप्रणाली से जिले के पत्रकारों में भारी आक्रोश है। अब पत्रकार संगठन इस मामले को डीआईजी और डीजीपी तक पहुंचाने की तैयारी में जुट गए हैं। सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर पत्रकारों से जुड़े मामलों में ही क्यों अक्सर गंभीर धाराएं हटाई जाती हैं और कमजोर धाराएं लगाकर अपराधियों को बचाया जाता है?
क्या दबाव में काम कर रही पुलिस?
इस पूरे घटनाक्रम ने कोतवाली नगर पुलिस की भूमिका को कटघरे में ला खड़ा किया है। क्या पुलिस पर राजनीतिक या किसी अन्य प्रकार का दबाव है? या फिर यह किसी साजिश का हिस्सा है? जो भी हो, जिले की कानून व्यवस्था की साख पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।
पुलिस की निष्क्रियता और पक्षपातपूर्ण रवैया अब साफ तौर पर उजागर हो चुका है। पत्रकारों पर हमला और फिर उनके खिलाफ झूठे मुकदमे—यह बताता है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला करने वालों को कहीं न कहीं सत्ता या व्यवस्था का मौन समर्थन प्राप्त है। यदि शीघ्र और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मुद्दा राज्यव्यापी आंदोलन का कारण बन सकता है।
वैभव वार्ष्णेय
जनपद एटा
मो.8006209854
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