इस विषय पर मैं एक जिम्मेदार पत्रकार संजय कश्यप हूं, में संतुलित और प्रभावी कहानी लिख रहा हूँ, जिसमें सनसनी से ज्यादा पत्रकारिता के पक्ष-विपक्ष को दिखाया गया है।
दुनिया के सबसे संवेदनशील इलाकों में गिने जाने वाले ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने पूरे विश्व को चिंता में डाल दिया है। मिसाइलों की गड़गड़ाहट, आसमान में मंडराते लड़ाकू विमान और सायरनों की आवाज़ों ने आम जीवन को जैसे थाम सा दिया है। कई शहरों में लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं। रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और सीमावर्ती क्षेत्र भय और अनिश्चितता से भरे हुए हैं। बच्चों की आंखों में डर है, बुजुर्गों के चेहरों पर चिंता की लकीरें हैं, और हर परिवार के मन में एक ही सवाल—”आख़िर ये सब कब रुकेगा?”
इसी उथल-पुथल के बीच खबरों की दुनिया भी पीछे नहीं है।
भारत में बैठी मीडिया संस्थाओं के लिए यह युद्ध सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय घटना नहीं, बल्कि दर्शकों तक सबसे पहले और सबसे तेज़ खबर पहुंचाने की होड़ भी है। इसी प्रतिस्पर्धा में देश के प्रमुख समाचार चैनलों में से एक आज तक ने अपने तीन पत्रकारों को युद्धग्रस्त क्षेत्र में भेज दिया।
चैनल का दावा है कि यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि दर्शकों को घटनास्थल से सच्ची और सटीक जानकारी मिल सके। उनके संवाददाता बमबारी के बीच खड़े होकर लाइव रिपोर्टिंग कर रहे हैं—पीछे धुएं के गुबार, सायरनों की आवाज़ें और भागती हुई भीड़ दिखाई देती है।
लेकिन सवाल यहीं से उठने लगते हैं।
कुछ लोग इसे साहसी पत्रकारिता मानते हैं। उनका कहना है कि युद्ध की असली तस्वीर दिखाना मीडिया की जिम्मेदारी है। अगर पत्रकार खतरा मोल नहीं लेंगे, तो दुनिया तक सच्चाई कैसे पहुंचेगी? इतिहास गवाह है कि जमीनी रिपोर्टिंग ने ही कई बार दुनिया को युद्ध की भयावहता समझाई है। वहीं दूसरी ओर आलोचकों की राय अलग है।
उनका मानना है कि इस तरह की रिपोर्टिंग कई बार संवेदनशील स्थिति को सनसनीखेज बना देती है। कैमरे के सामने तेज आवाज़, नाटकीय अंदाज़ और “सबसे पहले” की होड़ कहीं न कहीं टीआरपी की प्रतिस्पर्धा को दर्शाती है। आलोचक सवाल उठाते हैं—क्या पत्रकारों की जान जोखिम में डालना ज़रूरी है, या यह दर्शकों की भावनाओं को झकझोर कर चैनल की लोकप्रियता बढ़ाने की कोशिश है?
युद्ध सिर्फ गोलियों और बमों से नहीं लड़ा जाता, बल्कि सूचनाओं के मोर्चे पर भी जंग होती है। कौन सी खबर दिखाई जाए, किस अंदाज़ में दिखाई जाए, और कितनी बार दिखाई जाए—ये सब दर्शकों की सोच पर गहरा प्रभाव डालते हैं। मीडिया की भूमिका यहाँ बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। एक तरफ सच्चाई दिखाने का कर्तव्य, दूसरी तरफ मानवीय संवेदनाओं का संतुलन।
इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल आम जनता का है—उन्हें निष्पक्ष जानकारी चाहिए, न कि डर बढ़ाने वाली प्रस्तुति। युद्ध की विभीषिका में फंसे लोगों को राहत, सुरक्षा और शांति की जरूरत है; और दुनिया को चाहिए सच्ची, संतुलित और जिम्मेदार पत्रकारिता।
टीआरपी की दौड़ में अगर खबरों की संवेदनशीलता खो जाए, तो पत्रकारिता का मूल उद्देश्य पीछे छूट सकता है।
युद्ध खत्म होते हैं, सीमाएं बदलती हैं, सरकारें बदलती हैं—लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता एक बार खो जाए, तो उसे वापस पाना बेहद मुश्किल होता है।
संजय कश्यप (भड़ास2मीडिया संपादक)
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नोट – अगर आपके फोन में लिंक ना खुले तो इस नंबर 9411111862 को सेव कर ले लिंक खुल जाएगा इसलिए बताया जा रहा है कि कुछ पत्रकार भाईयों की शिकायत है कि लिंक नहीं खुल रहा है
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