जयपुर।राजस्थान की राजधानी जयपुर में पत्रकारों के प्रमुख संगठन Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) के नेतृत्व में चल रहा धरना शुक्रवार को पांचवें दिन भी जारी रहा। यह धरना वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यटन व्यवसायी उपेन्द्र सिंह राठौड़ के समर्थन में आयोजित किया जा रहा है, जिन्होंने प्रशासन पर उनकी आजीविका नष्ट करने और दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई करने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
धरना स्थल पर मौजूद पत्रकारों ने आरोप लगाया कि सरकार और प्रशासन की अनदेखी के कारण उन्हें पिछले पांच दिनों से खुले में रहना पड़ रहा है। भीषण गर्मी, उमस और मच्छरों के बीच सड़क पर बैठकर विरोध दर्ज कराया जा रहा है। नहाने-धोने और अन्य दैनिक आवश्यकताओं के लिए उन्हें सार्वजनिक शौचालयों और सीमित सुविधाओं पर निर्भर रहना पड़ रहा है। संगठन ने इसे लोकतंत्र में पत्रकारों के सम्मान के खिलाफ बताते हुए सरकार की संवेदनहीनता पर सवाल उठाए हैं।
क्या है पूरा विवाद?
जैसलमेर निवासी उपेन्द्र सिंह राठौड़, जो कि दैनिक समाचार पत्र “द पुलिस पोस्ट” के प्रधान संपादक और IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष भी हैं, ने आरोप लगाया है कि उन्हें वर्ष 2004 में प्रशासन द्वारा “DESERT” क्लब के पास 100×80 वर्गफीट का भूखंड रेस्टोरेंट संचालन के लिए आवंटित किया गया था।
राठौड़ के अनुसार, उन्होंने इस भूखंड पर अपने खर्चे से रेस्टोरेंट का निर्माण किया और पिछले लगभग 22 वर्षों से नियमित रूप से किराया, बिजली, पानी और अन्य सभी देयकों का भुगतान किया। जनवरी 2025 से किराया बढ़कर ₹45,000 प्रतिमाह हो चुका था और दिसंबर 2025 तक का किराया भी जमा कराया जा चुका था।
उन्होंने यह भी बताया कि कोरोना काल के दौरान, जब रेस्टोरेंट लगभग डेढ़ वर्ष तक बंद रहा, तब भी प्रशासन द्वारा किराया वसूला गया।
बिना लिखित आदेश के खाली कराने का आरोप
राठौड़ का आरोप है कि नवंबर 2025 में जिला कलेक्टर द्वारा बिना किसी लिखित आदेश के मौखिक रूप से तीन दिन में रेस्टोरेंट खाली करने के निर्देश दिए गए। इस आदेश से आहत होकर उन्होंने प्रशासन से संवाद करने और उच्च अधिकारियों तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयास किया, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला।
अंततः उन्हें न्यायालय की शरण लेनी पड़ी, जहां से उन्हें स्थगन आदेश प्राप्त हुआ।
कार्रवाई और बढ़ा विवाद
पीड़ित के अनुसार, न्यायालय से राहत मिलने के बाद प्रशासन की कार्रवाई और तेज हो गई। 23 दिसंबर को विभिन्न विभागों — जिला रसद, आबकारी, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और विद्युत विभाग — के माध्यम से लगातार कार्रवाई की गई।
इन कार्रवाइयों के तहत:
कमर्शियल गैस सिलेंडर जब्त किए गए
किचन को सील कर दिया गया
लाइसेंस नवीनीकरण रोक दिया गया
पर्यटकों के वाहनों के चालान कराए गए, जिससे कारोबार प्रभावित हुआ
राठौड़ का आरोप है कि 18 फरवरी को उनके रेस्टोरेंट में रखा लाखों रुपये का सामान सीज कर दिया गया और इसके बाद 17 मार्च को जेसीबी मशीनों से पूरे ढांचे को ध्वस्त कर दिया गया। उनका दावा है कि इस कार्रवाई से उन्हें करीब डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है।
पर्यटन और पत्रकारिता में योगदान
उपेन्द्र सिंह राठौड़ का कहना है कि वे पिछले तीन दशकों से पर्यटन और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने गुजरात में Rann Utsav जैसे आयोजनों में शुरुआती योगदान दिया और जैसलमेर के सम क्षेत्र में पर्यटन कैम्पिंग की अवधारणा को विकसित किया।
उनका दावा है कि आज इस क्षेत्र में 167 से अधिक कैम्प और रिसॉर्ट संचालित हो रहे हैं, जिनसे करीब 12,000 परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है।
धरना और चेतावनी
IFWJ के पदाधिकारियों का कहना है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे पत्रकार समुदाय की सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा है। यदि प्रशासन द्वारा इस तरह की कार्रवाई जारी रहती है, तो यह पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही संतोषजनक समाधान नहीं निकाला गया, तो आंदोलन को पूरे प्रदेश में विस्तारित किया जाएगा।
क्या है मांग?
राठौड़ और उनके समर्थकों की मुख्य मांगें हैं:
पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच
हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई
सामाजिक प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना
प्रशासनिक कार्रवाई की जवाबदेही तय करना
उन्होंने बताया कि इस मामले की जानकारी राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को भी दी जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
यह मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है —
क्या प्रशासनिक कार्रवाई पारदर्शी थी?
क्या एक पत्रकार को निशाना बनाया गया?
या यह पूरी तरह वैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा था?
इन सवालों के जवाब तभी मिलेंगे जब निष्पक्ष जांच होगी।
फिलहाल जयपुर में धरना जारी है और पत्रकार समुदाय सरकार से जवाब की प्रतीक्षा कर रहा है। यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की आजीविका का नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता और सुरक्षा का भी है।
अगर समय रहते समाधान नहीं निकला, तो यह मुद्दा आने वाले दिनों में बड़ा जनआंदोलन बन सकता है।
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