हरिद्वार से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने एक बार फिर कानून-व्यवस्था और पत्रकारों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला शहर की पुष्पक गैस एजेंसी से जुड़ा है, जहां कथित रूप से गैस सिलेंडरों की अवैध रिफिलिंग का काम चल रहा था। इसी सूचना के आधार पर हरिद्वार के तीन पत्रकार—देवम मेहता, अर्चना धींगरा और विश्वास सैनी—मौके पर पहुंचे। बताया जा रहा है कि जैसे ही इन पत्रकारों ने मौके पर रिफिलिंग का काम होते देखा और उसे रिकॉर्ड करना शुरू किया, वहां मौजूद कर्मचारियों में हड़कंप मच गया। आरोप है कि एजेंसी के कर्मचारियों ने सच्चाई सामने आने के डर से पत्रकार देवम मेहता को जबरन पकड़कर बंधक बना लिया। कुछ समय तक उन्हें वहीं रोके रखा गया, जिससे हालात और भी तनावपूर्ण हो गए। इस दौरान बाकी पत्रकारों ने विरोध जताया और मामले की सूचना पुलिस को दी। लेकिन कहानी में मोड़ तब आया, जब कार्रवाई की उम्मीद कर रहे पत्रकारों को ही पुलिस की तरफ से झटका मिला। आरोप है कि पुलिस ने मामले की निष्पक्ष जांच करने के बजाय उल्टा तीनों पत्रकारों—देवम मेहता, अर्चना धींगरा और विश्वास सैनी—के खिलाफ ही रंगदारी (एक्सटॉर्शन) का मुकदमा दर्ज कर दिया। इस घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं— क्या सच उजागर करना अब अपराध बन गया है? क्या अवैध काम करने वालों पर कार्रवाई करने के बजाय आवाज उठाने वालों को ही दबाया जाएगा? और सबसे बड़ा सवाल—क्या यही है उत्तराखंड की “मित्र पुलिस” की कार्यशैली? पत्रकारों का कहना है कि वे केवल अपना कर्तव्य निभा रहे थे और समाज के सामने सच लाने की कोशिश कर रहे थे। वहीं, इस पूरे मामले ने स्थानीय मीडिया और पत्रकार संगठनों में रोष पैदा कर दिया है। निष्पक्ष जांच और पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मुकदमे को वापस लेने की मांग उठने लगी है। अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाता है—क्या सच्चाई सामने आएगी या फिर यह मामला भी दबा दिया जाएगा।
इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अगर इसी तरह दबाया जाएगा, तो आम जनता की आवाज आखिर कौन उठाएगा?
