Haridwar— आस्था की नगरी, जहां सच और विश्वास की मिसाल दी जाती है… लेकिन इन दिनों यह शहर एक ऐसे मुद्दे को लेकर चर्चा में है, जिसने पत्रकारिता की साख पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता आज कुछ लोगों की वजह से कठघरे में खड़ी नजर आ रही है। शहर में चर्चाएं हैं कि कुछ तथाकथित पत्रकारों ने इस पेशे को मिशन नहीं, बल्कि “लिफाफा सिस्टम” बना लिया है।
कहा जा रहा है कि “लिफाफों की दौड़” अब इतनी तेज हो चुकी है कि कुछ लोग लिफाफा ऐसे लेते हैं, मानो Narendra Modi ने इनके लिए “आठवां वेतन आयोग” लागू कर दिया हो। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां वेतन किसी नीति से नहीं, बल्कि डर और दबाव से हासिल किया जाता है।
सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, शहर में एक ऐसा नेटवर्क भी सक्रिय है जो खबरों के नाम पर ब्लैकमेलिंग करता है। छोटे व्यापारियों, दुकानदारों और निर्माण कार्य से जुड़े लोगों को निशाना बनाकर पहले कमियां खोजी जाती हैं, फिर उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की धमकी दी जाती है। इसके बाद शुरू होता है “सेटिंग” का खेल—अगर पैसे दे दिए जाएं तो मामला दबा दिया जाता है, नहीं तो वही खबर सनसनी बनकर सामने आती है।
इसी के साथ एक और खतरनाक प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है—“सबसे तेज पत्रकार” बनने की होड़।
मोबाइल और सोशल मीडिया के दौर में हर कोई सबसे पहले खबर देने की दौड़ में है। हालात इतने विचित्र हो गए हैं कि शहर में तंज कसा जाने लगा है—
“घटना घटी नहीं, और ये पहले पहुंच जाते हैं…”
कुछ लोग तो इन्हें “यमदूत पत्रकार” तक कहने लगे हैं—जो घटना से पहले ही मौके पर मौजूद नजर आते हैं। यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती…
शहर में इन दिनों एक और नाम चर्चा में है—“भैया जी”।
हाल ही में आई मनोज वाजपेयी की मुवी भैया जी की तर्ज पर लोग इस किरदार से तुलना कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि हरिद्वार में भी एक “भैया जी मॉडल” उभर चुका है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, ये “भैया जी” बाहर से बेहद सलीकेदार और साफ-सुथरे नजर आते हैं—कपड़ों पर एक भी दाग नहीं मिलेगा… लेकिन उनकी छवि पर सवालों के दाग जरूर दिखाई देते हैं।
आरोप यह है कि ये खुद को पत्रकार बताकर उन जगहों पर पहुंच जाते हैं जहां एचआरडीए के नियमों के विपरीत निर्माण कार्य हो रहे होते हैं। वहां कार्रवाई की मांग करने के बजाय, “सेटिंग” के जरिए अपना तथाकथित “आठवां वेतन वाला लिफाफा” लेने की कोशिश की जाती है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह बताई जा रही है कि जिन “भैया जी” का नाम लिया जा रहा है, उन्हें पहले ही एचआरडीए से बर्खास्त किया जा चुका है, इसके बावजूद वे खुद को “प्राइवेट एचआरडीए पत्रकार” बताकर लोगों पर प्रभाव बनाने की कोशिश करते हैं।
यह पूरा मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है—
क्या पत्रकारिता अब सिर्फ एक पहचान पत्र तक सीमित हो गई है?
क्या कोई भी व्यक्ति कैमरा और माइक लेकर खुद को पत्रकार घोषित कर सकता है?
और क्या ऐसे लोगों पर कोई कार्रवाई होगी?
स्थानीय नागरिकों में इसको लेकर नाराजगी और डर दोनों मौजूद हैं। कई लोग सामने नहीं आना चाहते, क्योंकि उन्हें बदनामी और झूठे विवादों का डर रहता है। यही डर ऐसे तथाकथित लोगों के लिए सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।
मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की गतिविधियां पत्रकारिता के मूल उद्देश्य को खत्म कर रही हैं। पत्रकारिता का काम है—सच दिखाना, समाज को जागरूक करना और सत्ता से सवाल करना। लेकिन जब यही पेशा डर और वसूली का जरिया बन जाए, तो इसका असर पूरे लोकतंत्र पर पड़ता है।
अब सवाल प्रशासन और जिम्मेदार संस्थाओं पर है—
क्या ऐसे मामलों की जांच होगी?
क्या असली और फर्जी पत्रकारों की पहचान कर सख्त कार्रवाई की जाएगी?
या फिर यह “लिफाफा सिस्टम” यूं ही चलता रहेगा?
नोट – अगर आपके फोन में लिंक ना खुले तो इस नंबर 9411111862 को सेव कर ले लिंक खुल जाएगा इसलिए बताया जा रहा है कि कुछ पत्रकार भाईयों की शिकायत है कि लिंक नहीं खुल रहा है
