मेरठ में पत्रकारिता बनाम पुलिसिया सख्ती – DSP सौम्या अस्थाना के बयान से छिड़ी बहस”
उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक ऐसा बयान सामने आया जिसने मीडिया और पुलिस के रिश्तों पर नई बहस छेड़ दी है। मेरठ की डीएसपी सौम्या अस्थाना का एक कथित आदेश चर्चा में है, जिसमें कहा गया—
“किसी भी थाने के अंदर पत्रकार द्वारा वीडियोग्राफी की जाती है तो तत्काल मुकदमा दर्ज होगा।”
यह बयान सामने आते ही पत्रकार संगठनों, सोशल मीडिया और स्थानीय राजनीतिक हलकों में सवालों की झड़ी लग गई। आखिर ऐसा क्या हुआ कि थानों के भीतर कैमरा ले जाने पर सीधे मुकदमा दर्ज करने की चेतावनी दी गई?
क्या है पूरा मामला?
सूत्रों के अनुसार हाल के दिनों में कुछ पत्रकार थानों के अंदर जाकर वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे। पुलिस का तर्क है कि थाने के भीतर कई संवेदनशील दस्तावेज, आरोपी, पीड़ित और गोपनीय जानकारी मौजूद होती है। ऐसे में बिना अनुमति वीडियोग्राफी से न केवल जांच प्रभावित हो सकती है, बल्कि गोपनीयता का उल्लंघन भी हो सकता है।
लेकिन दूसरी ओर पत्रकारों का कहना है कि अगर पुलिस पारदर्शिता से काम कर रही है तो कैमरे से डर कैसा? उनका तर्क है कि कई बार थानों में पीड़ितों के साथ अभद्र व्यवहार, देरी या दबाव जैसे मामलों को उजागर करने के लिए वीडियो साक्ष्य जरूरी होते हैं।
कानूनी पक्ष क्या कहता है?
भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा माना गया है। लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और गोपनीयता के आधार पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
थाने जैसे संवेदनशील स्थान पर वीडियोग्राफी के लिए आमतौर पर पुलिस प्रशासन की अनुमति आवश्यक होती है। यदि बिना अनुमति रिकॉर्डिंग की जाती है और वह जांच या सुरक्षा में बाधा बनती है, तो संबंधित धाराओं में कार्रवाई संभव है।
यानी मामला सीधा “पत्रकार बनाम पुलिस” नहीं, बल्कि “प्रोटोकॉल बनाम अधिकार” का है।
बहस का असली मुद्दा
यह घटना सिर्फ एक बयान भर नहीं है। यह उस खाई को दिखाती है जो पुलिस और मीडिया के बीच लगातार चौड़ी होती जा रही है।
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पुलिस का कहना: अनुशासन और सुरक्षा पहले।
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पत्रकारों का कहना: पारदर्शिता और जवाबदेही पहले।
कई वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि सीधे “तत्काल मुकदमा दर्ज होगा” जैसे सख्त शब्दों की जगह स्पष्ट गाइडलाइन जारी की जानी चाहिए—किस परिस्थिति में, किस अनुमति के साथ और किस सीमा तक रिपोर्टिंग की जा सकती है।
क्या समाधान हो सकता है?
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स्पष्ट SOP (Standard Operating Procedure) जारी हो।
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थानों में मीडिया इंटरैक्शन के लिए निर्धारित स्थान तय किया जाए।
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संवेदनशील मामलों में अधिकृत ब्रीफिंग की व्यवस्था हो।
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पुलिस और पत्रकारों के बीच संवाद स्थापित हो।
