कथित गुंडागर्दी या सवालों से घबराहट? जब एक पत्रकार के सवाल से असहज हुईं चित्रा त्रिपाठी
आज का घटनाक्रम भारतीय मीडिया की उस सच्चाई को उजागर करता है, जिस पर अक्सर पर्दा डाला जाता रहा है। एक सार्वजनिक मौके पर जब एक स्वतंत्र पत्रकार ने सीधा और ज़रूरी सवाल पूछ लिया, तो जवाब तर्कों में नहीं, तेवरों में दिया गया। आरोप है कि चर्चित एंकर चित्रा त्रिपाठी ने सवाल सुनते ही आपा खो दिया और अपने चैनल की माइक को ही सामने वाले पत्रकार पर थोपते हुए आक्रामक रवैया अपना लिया।
घटना के चश्मदीदों और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो क्लिप्स के मुताबिक, सवाल सत्ता या सिस्टम से जुड़ा था—ऐसा सवाल, जो आम दर्शक भी पूछना चाहता है। लेकिन जैसे ही यह सवाल सामने आया, बहस की जगह कथित तौर पर बदसलूकी और दबाव ने ले ली। यही वह क्षण था, जब “बड़े चैनल की पत्रकारिता” और “ज़मीनी पत्रकारिता” आमने-सामने दिखी।
आलोचकों का कहना है कि यह वही मीडिया है जो स्टूडियो में बैठकर दूसरों को नैतिकता और कानून का पाठ पढ़ाती है, लेकिन जब खुद से सवाल किया जाता है तो सहनशीलता जवाब दे जाती है। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि सवाल पूछने वाले पत्रकार को डराने और चुप कराने की कोशिश की गई।
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई लोगों ने इसे “गोदी मीडिया की घबराहट” बताया, तो कई ने कहा कि आज पहली बार तथाकथित मुख्यधारा मीडिया का सामना असली, ज़मीनी मीडिया से हुआ—और वही सामना उसे असहज कर गया। “बिलबिलाकर पीछे हटना” जैसे शब्द इसी गुस्से और नाराज़गी की अभिव्यक्ति हैं।
“पत्रकार के सवाल से भड़कीं चित्रा त्रिपाठी: चैनल की माइक से दबाने का आरोप, असली मीडिया से सामना होते ही बढ़ा विवाद, गोदी पत्रकारिता पर फिर उठे सवाल” pic.twitter.com/Qx8d1e4h72
— bhadas2media (@bhadas2media) January 21, 2026
मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि पत्रकारिता का मूल सवाल पूछना है, न कि सवालों से भागना। अगर कोई एंकर सवाल से नाराज़ हो जाए, तो यह उसके पेशेवर आत्मविश्वास पर सवाल खड़ा करता है। लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता से सवाल करना है, चाहे वह सत्ता राजनीतिक हो या मीडिया की खुद की ताक़त।
हालांकि चित्रा त्रिपाठी या उनके चैनल की ओर से इस मामले में क्या पक्ष रखा जाएगा, यह सामने आना अभी बाकी है। निष्पक्षता की मांग यही है कि पूरा संदर्भ सामने आए। लेकिन इतना तय है कि इस घटना ने मीडिया की भूमिका, व्यवहार और जवाबदेही पर एक नई बहस छेड़ दी है।
आज दर्शक यह देख रहा है कि कौन सवाल से भागता है और कौन सवाल से टकराने की हिम्मत रखता है। पत्रकारिता का सम्मान शोर से नहीं, संयम और जवाब से बचता है। अगर सवाल पूछने पर आक्रोश ही जवाब बन जाए, तो यह सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं, पूरी मीडिया संस्कृति के लिए चेतावनी है।
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